प्रकाकश्षक- विश्वविद्यालय हिन्दी प्रकाशन,

नखनकऊ विश्वविद्यालय, नखनऊ

प्रथम संस्करण; सं० २०२५ घि० ल्य़्‌ हर ९-)5 रुपये दर्थित बुर १५,

ढखचऊ विश्व विद्या छय हिन्दी अर्कीशिन ्॑

मुद्रक-- स्टेन्डड प्रिन्टर्स, ८६, न्यू माडल हाउस, लखनऊ

पूज्य पिता स्वर्गीय बांबू जयप्रसाद जी अग्रवाल की पुण्य स्मृति को सादर, सविनय समर्पित

कतज्ञता-प्रकाश

श्रीमाम सेठ शुभकरन जी पैकसरिया ने लखनऊ विश्वविद्यालय की रजत-जयंत्री के अवसर पर बिसवाँ सुगर फैक्टरी की ओर से वीस सहस्त्र रुयये का दान देकर हिन्दी-प्रिभाग की सहायता की है। सेठ जी का यह दान उनके विशेष हिन्दी अनुराग का बद्योतक है इस घन का उपयोग हिन्दी में उच्चकोटि के मौलिक एवं गवेपणात्मक ग्रन्थों के प्रकाशन के लिए किया जा रहा है जो श्री सेठ शुभकरत सेकसरिया जी के पिता के नाम पर सेठ भोलाराम सेकसरिया ग्रन्थ माला से संग्रन्थित हो रहे हैं। हमें आशा है कि यह ग्रन्थ माला हिन्दी साहित्य के भंडार को समृद्ध करके ज्ञान वृद्धि में सहायक होगी श्री सेठ शुभभरन जी की इस अनुकरणीय उदारता के लिए हम अपनी हादिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं

दीनदयाहु गुप्त भूतपूर्व प्रोफेसर तथा अध्यक्ष, हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, लखनऊ विएवविद्यालय

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महाराज पृथ्वीराज चौहान (तृतीय)

अध्ययन क्रम

आमुण्ठ १-६ संक्षिप्त रूप पहला अध्याय १-२३ राजपूत : शब्द तथा इत्तिहास १-७ राजपूतों के ३६ वंश तथा उनका इतिहास ७-२३ दूसरा अध्याय २४-१५०

हिन्दू पान्न : शासक वर्ग

राजा--२४, अजयसिंह--२६, अनंगपाल--२७, अरिमंत- ३४, अस्थूलनंद-३५, आनन्द- देव--३५, आानन्दराज-३६, आानलराज अथवा आना--३६, उद्दारहार-३९, क्रिस्तराज अथवा कृष्णराज-३९, चतुरवाहुमाण, चाहुवान, चौहान-४०, चदराय--४२, चन्द्रगुप्त-४२, चन्देलराज परमद्विदेव-४३, जोगसुर-४४, जयचन्द गाहड़वाल-४५, जयसिंह-६३, ध्रमसार अथवा घधमंसार-६४, धर्माधिराज-६४, नागहस्त-६४, प्रतापसिह-६६, प्रथवराई-६६, पृथ्वीराज चौहान--६७, बालप्लराइ-९८, विन्दसूर अथवा विन्दसार-९९, बिवुघसिह-९९, वीरसिह-१००, भोलाराय ( भीमदेव ) चालुक्य-१०१, मह॒देव क्षयवा महादेव--११४, महासिह-११४ मानिक्यराय--११४५; मोहन्त-११७, मोहसिह-११८+ रामसिह--११८, रैससी अथवा र॑नसिह-११९, -लोहधीर अयवा लोहसार--१२१, विजयपाल-१२२, वीरदण्ड-१२५, वीरसिह--१२५, वीसलदेव-१२६, वेरसिह-१३७,' संकाविड़ार-१३८, संग्रामसिह-१३८, सम्प्रतिराय-१३९, सामन्तदेव-१४०, सारंगदेव--१४०, सेनराय अथवा सेनराज-१४४, सोमेश्वर-१४४, हरिहरराय-१४९

तीसरा अध्याय १५१-२७६ हिन्दू पात्र : सामन्त वर्गं

मचलेस चौहान-१५१, अमरसिह सेंवड़ा-१५२, अल्हणकुमार १५६, आरज्जपिह-१५८५, आल्हा-ऊदल-१५९, फचराराय-१६५, कनकराय बड़गुज्जर-१६७, कन्ह (कर्नाटक नरेश)-१६८, कन्ह चौहान-१६९, कान्ह कमघज्ज-१७ १, काशी नरेश-१७२, कुम्भा जी--१७३, कुमोदमनि-- १७४, क्रंभराय-१७५, केहरि कण्ठीर-१७६, कैमास दाहिम-१७७, खेमकरन खंगार, वीरसिह तथा जराधिह--१८३, गोविन्दराय गहलौत-१८३, चण्डपुण्डीर-१८५, चामण्डराब दाहिम- पृ, छग्गनराय-१९१, जंघाराभीम-१९२, जसवन्त सिह--१९३, जेसिंह कमघज्ज-१९४, जैतप्रमार--१९४, जोबनराय-१९७, तिरहुत नरेश-१९७, देवराज वग्गरी अथवा वग्गरीराव- १९९, प्रमाइन कायस्थ-१९९, घोर पुण्डीर--२००, नरपाल ( नैपाल नरेश )-२०३,

रे

नरसिह दाहिम-२०४, नाहरराय-२०६, निदुदुरराय--२०७, पंचाइन ( चन्देरी नरेश )- २०९, पज्जूतराव कूर म-२११, प्रतापविह-२१३, परवंतराय-२१४, प्रसंगराय खींची-२१४, पल्हन कुमार-२१५ परहांडराय तोमर-२१५, परावस पुण्डीर-२१६, वखरेत-२१७, वलभद्र कमधज्ज-२१७, वलिमद्र तथा उसका भाई-२१८, वालराय-२१९, वालुकाराय- कमधज्ज- बिल्लराज-२२१, वेनीदत्त ब्राह्मफ-२२२, मकवाना-२२३, मर्ल सिह-२२४, महादेव राय- २२४५, मंगल मेवातपति-२२५, रतनसिह-२१८, रनघीर राय-२२८ रयसलल्‍लराय कंमघज्ज- १, रावन-२३१,_ रावल समर सिह-२३५, लापन बधेल-२४५, लंगालंगरीराय-२४६, लापनविह-२५०, लोहाना आजानवाहु-२४२, विजयपाल-२५४, वीरचन्द कमघज्ज-२५५, वोर्मराय--२५५, सजमराय--२५७, सलपराय प्रमार-२५९, सारगढेव जाट--२६०, सारंग- देव सोलंकी--२६१, पथिंह प्रमार-२६२, सुमंत--२६३, सुलपपर्वार--२६७, हरिसिह-२६८, #ड़ा हम्मीर--२६९, हाहुलीराय--२६९, हैजमकुमार प्रतिहार-२७५। चौथा अध्याय २७७४-३४ मुसलमान पात्र भरवरखा-२८०, आलमखाँ-२८१, उजवकखाँ--२८२, कलीखाँ कुंजरी-२८२, खाँ पैदा महमूद -२८२, खानखाना-२८३, खानखाना हजरतखा-२८४, खिलचीखा--२८५, खुरासानखाँ- २८६, गाजीखाँ-२८६, जलाल जलूस-२५७, जहाँगीर खाँ-२०७, तातारखाँ-२८५, तातार निमुरत्तवा--२९३, दुष्तमखा--२९५, घरिखाँ--२९६, निमुरत्तवा-२९६, नू रमुहम्मद-२९७, पश्चिमी खाँ--२९८, पहाड़ोखाँ गोरी-२९८, वलीखाँ एवं अलीखाँ-२९८, बाहवलखाँ--२९९, भट्ट! महनगंखा-२०० मगोल लल्लरी-३१०१,. महमूद्खाँ--३०२, मियां मनसूर रूहिल्‍ला-- ३०३२, भिर्याँ मुस्तफा-३०३, मोर कम्मोद्खा-३०४, रूमीखाँ तथा वहरामखाँ--३०४, शाह- शह बुद्दीन मुईजुहीन सुल्तान गोरी--३०५, सहवाजखाँ--३३०; सुभानखा--३३०,' हवाशखा-- ३३१, हिन्दूबाँ--३३१ हुजावनूरोखाँ-३३२, हुस्सेन खाँ-३३२, हस्सेत--३ ३४

पांचवाँ अध्याय भा ३४२-३६२ काह्पनिक पात्र

लिंग पर्वितं--३४३, सकेतिक भाप ---३४३, पूर्व. जन्म की, स्मति--३४४४, फलादि द्वारा सन्‍्तानोत्यति-३४५, अप्राकृत जन्म--३४४५., राजा का दंची चनाव--३४६, भत्ताताई--३५० वावन वीर--३५४, अन्य काल्पनिक पात्र-३५४, ऋषि-मुनि--३५४, काजी, फकीर, बौलिया आदि ५१९. * छठा अब्याय ३६३-४०९ स्त्री-पात्र हु ड्धिन--३६३ इन्द्रावती--३६६., कमला (पृथ्वीराज की माता)--३६९, करनाटी--

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३७३, कूअर पद मस्रेन -“-३७६, चित्ररेखा-_३७६, जुन्हाई--३७८, सुन्दरी--३८०, दाहिमी- ३८, ढूती अथव) योगनी--३८४, पदमावती--३८५, पृथाबाई-..३८९, पुण्डरनो-..३८९, लाले (खतन्राणी बाला ), ३९०, स्योगिता--३९०, सुरसुन्दरी--४००, शशिवत्ता--४०१, हसावती--४०७ दर

सातवाँ अध्याय ४१०-४३ राज्य कवि एवं पुरोहित वर्ग

कमल भट्ट ४११, कविचन्द-..४११, गृरुराम-..४२०, जगदेव भाट-...४२३, . दुर्गा- केदार 7४२४ भानु-_४२७, माघों भाट--४२८; श्रीकंठ--४३०, हाज़ीखाँ काजी--४३१ | उपसंहार ४३२-४३५ परिशिष्ट ४३७-४९० १. प्रबन्ध चिन्तामणि._(अ) वीसल विग्रहराज-_४३७; (ब) परम सेवक-_४३७; (स) पृथ्वीराज वधघ-.४३८; पृथ्वीराज विजय महाकाव्य--चाहमान वंश कीतृंनम्‌-.४३९, बिजोलिया का शिलालेख-..४४४५, सुर्जन चरित-... (१) चाहमान उत्पत्ति--४४८, (२) चाहमान वशावली-_४४९, (३) कान्यकुब्जेश्वर जयचन्द की कन्या कान्तिमती--४५२, (४) वाण वेघ--४५३,

हम्मीर महाकाव्य-...४५४५, हपंनाथ के मंदिर का शिलालेख-४५६, सुृजान चरित--४५९, गाहड़वाल-वश--४६०, महाकवि चन्द वरदायी का वंशं-वृक्ष--४६१, १०. दिल्‍ली के तंवरों की वंशावली (१)--४६३, दिल्‍ली के तंवरों की वंशावली (२)--४६४, ११. देवगिरि के यादवों की वंशाचली-- ४६५, १२, चौहानों की घंशावली- १. हर्षनाथ के मंदिर की प्रशस्ति के अनुसार-४६६, २. बिजौलिया के शिलालेख के अनुसार-.-४६७, ३. पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के अनुसार--४६९,

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प्रबन्ध कोश में दी हुई चौहानों की वंशावली के अनुसार--४७१, हम्मीर महाकाव्य के अनुसार--४७३, « सुर्जनचरित के अनुसार....४७५, « रासो के विभिन्न संस्करणों के अनुसार ८. पं० सदाशिव दीक्षित के अनुसार-...४७७, १३. भीमदेव चालुक्य फा वंशवृक्ष-.. १. चालुक्य वंश- श्री के० एमं० मुंशी के मनुसार-४८5०, २. चालुक्‍्य वंश--डाँ वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार--४८१, १४, मुइज्जुद्दीन मुहम्मद गोरी का वंश वृक्ष--४८२, १५. सहायक ग्रन्थ सूची---४८३-४९०

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आमुख

आदि कालीन हिंन्दी साहित्य में पृथ्वीराज रासो का स्थान निविवाद रूप से अन्यतम है। इस महत्व पूर्ण कृति के एक अंश को पढ़ने का सर्वप्रथम अवसर मुझे एम० ए० (प्रथम वर्ष) में प्राप्त हुआ। क्ृति की महत्ता से प्रभावित होकर मैंने एम० ए० ( द्वितीय वर्ष ) में भी 'चन्द वरदायो” का अध्ययन घिशेष कवि के रूप में किया मेरी रुचि देखकर श्रद्ध॑य गुरुवर डॉ० विपिनविहारी त्रिवेदी जी ने मुझे पृथ्वीराज रासो के पान्नों की ऐतिहासिकता पर शोध-कार्य करने का भादेश दिया। अतः उनकी श्ाज्ञा तथा तत्कालीन विभागाषध्यक्ष डॉ दीनदयालु जी गुप्त की सहमति से मैं पृथ्वीराज रासो के पात्रों की ऐतिहासिकता' के अध्ययन से प्रवृत्त हुआ। सन्‌ १९६१ में इसी प्रवन्ध पर लखनऊ विश्वविद्यालय से पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त हुई

इतिहास- के अनेक. स्थल इतने अंधकार पूर्ण हैं. कि निरन्तर खोज होते रहने पर भी मजी तक उन: पर सम्यक््‌ प्रकाश: नहीं डाला जा सका है-। भारत-की केन्द्रीय राजसत्ता का अन्‍्तः होने के: उपरान्त लगभग १३वीं शताब्दी, के.पूर्व: तक उत्तरी भास्त का इतिहास ऐसा ही अंधकारमय है

राजा हर्ष के. उपरान्त प्रायः. सभी राज्यों ने अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया १० वीं शताब्दी के.अन्तिम चरण.-में उत्तरों भारत में पाल, गाहड़वाल, चालुक्य, चन्देल तथा चौहानः राज्यों के. अतिरिक्त युजरात; तथा, मालवा के दो ओर स्वतंत्र राज्य स्थापित हो. चुके थे ११: वीं-१२वीं शताब्दी में उत्तर भारत की शक्तियों का प्रायः ह्ाव्व हो चुका था वहाँ, सात. प्रमुख स्वतंत्र राज्य-थे जिनमें कोई भी किसी एक बड़े. राज्य के भाघीन रह. कर कार्य- करने को. प्रस्तुत: था;

इस युग' की। राजनीतिक पृष्ठभूमि देखने से. स्पष्ट' होः जाता है कि सातवी-आठवी शताब्दी में बाह्य शक्तियाँ प्रबल- थीं।। ९वीं शताब्दी तक सजवीतिक सगठन' इतना बमशकक्‍्त हो गया-था कि उसका. सामत्ा कर, कोई. भी सफलता" की आशा नहों कर सकता था। परस्पर- विरोध एवं शक्ति के छिन्नःभिन्न हो जाने-के कारण विदेशी अशक्रमणकयरियों को मात्तों. खुला: निमंत्रणः प्राप्त हो गया था |

तत्कालीन साहित्य में भारत के राज्यों के पारस्परिक झगड़ों पर अच्छा प्रकाश पड़ता है पृथ्वीराज रासो सामथिक राजनीतिक बवस्था का जीता-जागता प्रमाण है। दिल्ली- अजमेर के अन्तिम हिन्दू शासक पृथ्वीराज चौहान (तृतीय), कन्नौजपति जयचन्द गाहड़वाल, गुर्जरेश्वर भीमदेव चालुक्य, चन्देलराज परमदिदेव के पारस्परिक संघर्ष एवं गजनीपति शाह शहावुद्दीन गोरी के आक्रमणों का 'रासो' में रोचक चित्रण हुआ है

अपनी विकसनशील प्रवृति के कारण रासो का अस्तित्व भी शका की दृष्टि से देखा जाने लगा, इसका मूल कारण था एंतिहासिक व्यक्तियों का चित्रण इतिहास वैेत्ताओं ने चरित्रों के विवरणों को ताम्रपत्रों एवं शिला लेखों से मिलना प्रारम्भ किया और फिर हुई जमकर ग्रन्थ की कटु आलोचना इतिहासकारों ने रासो को अप्रामाणिक एवं अनैतिहा- सिक घोषित कर दिया किन्तु साहित्यिक विद्वानों ने रासो का साथ छोड़ा तथा कतिपय तथ्यों से, जो इतिहास की कसौटी पर भी पूरे उतरते थे, प्रेरणा ग्रहण कर अन्वेषण कार्य प्रारम्भ रखा तथा रासो की प्रामाणिकता एवं संभावित प्रक्षेपों को विज्ञजनों ने एक मत से स्वीकार किया पृथ्वीराज रासों की विविध वाचनाओं के विवरणों को देखने से स्पष्ट होता है कि मुख्यतः पृथ्वीराज रासो के चार-संस्करण प्राप्त होते हैं--

(१) लघुतम, (२) जघु, (३) भध्यम तथा (४) वृहद्‌

उक्त सभी रूपान्तरों पर दृष्टिपात करने से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारंम्भ में मूल रासों का परिमाण निश्चित रूप से पर्याप्त कम रहा होगा,'किन्तु जैसे-जैसे समय व्ययतीत होता गया तथा यह्‌ ग्रन्थ जनता के मध्य प्रसिद्ध होता रहा, वंसे-वैसे इसमें विकासात्मक परिवर्धन होता गया होगा

मूल रासो के परिमाण का ठीक-ठीक पता लगाना अत्यन्त कठिन कार्य है किन्तु रासो के चारों सस्करणों को देखने से इतना अवश्य स्पष्ट होता है कि इसमें कम से कम प्रारम्भ में नीन कथानक अवश्य रहे होंगे इस काव्य ग्रन्थ का 'सयोगिता स्वयंवर” मुख्य भाग होगा वास्तव में संयोगिता के कारण ही रासो ग्रन्थ प्राणवान है। 'कईमास वध” प्रकरण भी मूल रासो का एक अंश अवश्य रहा होगा, क्योंकि कमास बध विपयक अपकच्रश के तीन पद्यों में इसकी प्रामाणिक्रमा में अब किसी को सन्देह नहीं रह गया है तथा तृतीय और अन्तिम प्रकरण जिसके विपय में निश्चित रूप से कहा जा सकता है बढ़ शाहशह्दाबुद्दीन गोरी में युद्ध तथा पृथ्वी रःज द्वारा णब्द वेधी वाण चलाकर उसका वध हैं

सासो के लघूतम रूपान्तर की धघारणोज की प्रति संवत्‌ १६६७ की है। गेयकाव्य होने के कारण इममें स्वतः ही परिवतंन एवं परिवर्धन होता रहा होगा। यह संस्करण

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तो बीकानेर के श्री अगरचन्द नाहटा तथा दूसरी दिल्‍ली के डॉ० दशरथ शर्मा के पास है लेखक को डॉ शर्मा वाली प्रति की फोटो कापी देखने का सौभाग्य प्राप्त है। उक्त प्रति की एक फोटो कापी लखतऊ विश्वविद्यालय में सुरक्षित है। सम्भव है मूल रासो की कया इसी प्रति की कथा के आस-पास रही होगी कालानन्‍्तर में इसमें विकास हुआ होगा भौर परिणाम स्वरूप रासो का लघु झूपान्तर सम्मुख आया होगा

इस रूपान्तर में पर्याप्त परिवर्धन हुआ अनेक नए-नए प्रकरणों को जोड़कर कथा को बढ़ाया गया परिणाम स्वरूप बन तिहासिक तत्वों का समावेश भी होते लगा इस रूपान्तर में लगभग उच्चीस सर्ग अथवा समय हो गए जिनमें दो हजार पद तथा ३५ सौ ए्लोक हैं। इस रूपान्तर की अभी तक केवल प्रत्तियों की सूचना प्राप्त हो सकी है जो बीकानेर तथा लह्दौर के पुस्तक ग्रहालयों में सुरक्षित है

मध्यम रूप।न्तर की कथा में मोर भी अधिक विकास हो गया है लघु रूपान्तर से इसका परिमाण लगभग दूने से भी कुछ अधिक हो गया है इसमें कुछ ऐसे प्रकरण जोड़ दिए गए हैं जिनका अस्तित्व लघुतम एवं लघु खूपान्तरों में नहीं है, यह खरूपान्तर भी लघु के समान सर्गों अथवा समयों से विभाजित हैं तथा इनकी सख्या ४० से ४७ तक कही जाती है, सम्पूर्ण संस्करण में लगभग से १९ हजार तक श्लोक संख्या है तथा इसकी कुल ११ प्रतियाँ बीकानेर, अवोहर, लाहौर, पूना तथा कलकत्ता के पुस्तकालयों में विद्यमान है

रासो के वृहद्‌ रूपान्तर में अत्यधिक पाठ वृद्धि हुई है। इस संस्करण में कुछ ऐसी कथाओं को भी स्थान दे दिया गया है जिनका पृथ्वीराज के चरित्र से कोई सीधा सम्बन्ध हीं है यदि इन प्रकरणों को ग्रन्य से निकाल भी दिया जावे तक भी मूल कथा में किसी प्रकार का व्यवधान उपस्थित नहीं होता रासो के पाठ वृद्धि पर विचार करते हुए डॉ० नामवर सिंह से अपना विचार व्यक्त किया है कि-'बाद के परिवर्धन काल में लोहाना भाजानवाहु, पद्मावती विवाह पातिसाह ग्रहण, होली कथा, दीपमाला कथा तथा पृथ्वीराज विवाह जीड़े गए। असम्भव नहीं है कि इनमें से कुछ स्वतंत्र काव्य रूप में प्रसिद्ध रहे हों तथा १७ वीं-१८वीं शताष्दी में ही किसी ने इन्हें रासो के अन्तगंत मानकर लिपि घद्ध कर लिया हो ।' वास्तविकता कुछ भी हो, पर इतना निविवाद रूप से सत्य है कि बृहद्‌ ससकरण में प्रक्षिप्त अंश बहुत अधिक वढ़ गया जिससे सम्पूर्ण रासो ग्रन्थ शंका की दृष्टि से देखा जाने लगा रासो के वृहद रूपान्तर में ६४ से ६९ तक समय अथवा सर्ग तथा १३ से १७ हजार त्तक पद अथवा अनुष्टुप की ३१ मात्रा के हिसाब से ३० से ३६ हजार तक श्लोक संठ्या विद्यमान है। इस खूपान्तर की अभी त्तक ३३ प्रतियों की सूचना श्राप्त हुई है जो यूरोप, चस्वई, कलकत्ता, आगरा, काशी, बीकानेर आदि स्थानों में सुरक्षित है

उपयुक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि समय-समय पर मूल रासो में अवश्य ही परिव्धन होता रहा है नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा प्रकाशित पृथ्वीराज रासो वृहृद्‌ रूपान्तर

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के अन्त्गंत आता है। इसी रासो का अध्ययन करने के उपरान्त, उसकी प्रमाणिकता के सम्बन्ध में विदाद उठ खड़ा हुआ अधिकतर विद्वानों का यह मत हैं कि वर्तमान प्रकाशित पथ्वीराज रासो, भर्न हाप्तिक, अप्रामाणिक एवं काल्पनिक है। अन्य तीन रूपान्तरों पर दुष्टि- ,पात्त करने से स्पप्ठ हो जाता है कि कुछ स्थल ऐसे भवश्य है जिसके सम्बन्ध में तीनों सस्करणों में कोई उल्लेख तक प्राप्त नहीं होता अतः निश्चित है कि बहुद्‌ रूपान्तर में कुछ क्षेपक होने के कारण ही वह आज-कल इतने विकृत रूप में मिलता है तथा उसकी ऐतिहासिकता भी शंका का विपय वन गई है। आज समस्त रूपान्तरों के आधार पर रासो का वैज्ञानिक एव संशोधित पाठ प्रस्तुत करने की नितान्त आवश्यकता है, जिससे साधारण पाठक भी रासो की वास्तविकता का थानन्द ले सके। डॉ० विपिनबिहारी तिवेदी जी ने लखबऊ विश्व- विद्यालय के तत्वावधान में रासो के सम्पादन का कार्य प्रारम्भ किया था किन्तु उनके असा- मयिक निघन से यह कार्य अधूरा पड़ा है।

प्रस्तुत अध्ययन क्रम में पृथ्वीराज रासो के सभी संस्करण तथा वाचनाएं उपलब्ध नहीं हो सकीं किन्तु फिर भी पृथ्वीराज रासो का अप्रकाशित रॉयल एशियाटिक प्तोसाइटी लन्दन का मध्यम, और लघु रूपान्तर तथा घारणोज का लघुतम रूपान्तर, डॉ त्रिवेदी जी की कृपा से मिल गया लेखक ने प्रवंध का मूल भाधार नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्रकाशित वृहद्‌ पृथ्वीराज रासों को ही बनाया है, किन्तु साहित्य सस्यान उदयपुर से प्रकाशित पृथ्वीराज रासो से भी प्रबन्ध को पूर्ण बनाने के लिए पर्याप्त सहायता ली गई है.।

प्रस्तुत मध्प्यन की रूप रेखा निर्धारित करने में कोई एक ग्रन्थ निश्चित पथ प्रदशन नहीं कर सका है फलतः कुछ स्थलों को छोड़कर लगभग सम्पूर्ण प्रवन्ध का विपय विभाजन

निजी मान्यताओं के अधार पर किया गया है। यहाँ प्रस्तुत अध्ययन क्रम के विभाजन की रांक्षिप्त रूप रेखा देना अनुपयुक्त होगा

प्रस्तुत प्रवग्ध सात अध्यायों में विभक्त है जिनमें पृथ्वीराज रासो .में आए हुए प्रमुख पात्रों को ऐतिहासिक कसौटी पर परखने का प्रयास किया गया है| प्रथम अध्याय में राजपूत शब्द की ब्युत्पत्ति-विवेचना के साथ-साथ राजपूत जाति के प्रमुख वशों का संक्षिप्त परिचया- त्मक इतिहास वर्णित है दूसरे अध्याय में शासक वर्ग के अन्तर्गत आने वाले हिन्दू पात्रों की ऐतिहाधप्विकता पर विचार किया गया है | ऐतिह।सिकता को अधिकाधिक प्रामाणिक बनाने के उद्द श्य से इतिहास ग्रन्यों के अतिरिक्त संस्क्ृत, प्राकृत तथा अपभ्रश साहित्य और डिगल साहित्य की ख्यात तथा बातों एवं घिला लेखादि का भी -उपयोग लेखक ने किया है तीसरे अध्याय में शासित वर्ग के अन्तर्गत भाने वाले मुख्य हिन्दू पात्रों की चर्चा है। जिन पात्रों के सम्बन्ध में इतिहास सर्वथा मौन है, उनके विपय में मध्ययन की आधारभूत सामग्री रूप में साहित्यिक कृतियों से सहायता ली गई है।

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पौधा अध्याय प्रमुख मुसलमान पात्रों से संवन्धित है। इस अध्याय में मुसलमान शासक एवं शासित दोनों वर्मों के पात्रों को एक ही साथ अध्ययन का आधार बना लिया गया है

पाँचवाँ अध्याय काल्पनिक पात्रों से संबन्धित है। इस अध्याय में कवि कल्पना भसूत पान्नों के विवेचन के साथ साथ कथा घिकास में उनके योगदान की चर्चा भी कर दी गई है

छठे अध्याय में स्त्री पात्रों की विधेचना है पृथ्वीराज रासो जैसे वीर काव्य में स्त्री पात्रों करा चित्रण प्राय: कम ही हुआ है किन्तु जो भी प्रसंग वश गई है, उनकी प्रामा- णिकता भी देखने का प्रयास किया गया है।

सातवां अध्याय विभिन्न राज्यों के राज कवि एवं पुरोहित वर्ग से सम्बन्धित है। इस ' कोटि के पान्नों की संख्या भी बहुत कम है इसी अध्याय में उन पात्रों की भी चर्चा हुई है जो सामान्य स्तर के है किन्तु कथा-विफास की दृष्टि से महत्व पूर्ण हे

भस्तुत प्रबन्ध में पृथ्वीराज रासो के लगभग सभी प्रमुख पात्रों का ऐतिहासिक विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है किसी भी युग के पातन्नों की ऐतिहासिकता खोजना मत्यन्त दुरूह काये है यह जान सकना सरल नहीं हैँ कि आज से लगभग २०-२१ वर्ष पूर्व भारत के स्वतत्नता संग्राम में किन-किन पृण्मात्माओं ने अपने अमूल्य प्राणों की आहुति दी थी, जाने कितने नाम ऐसे होंगे जिनके विषय में आज हम जानते तक नहीं, किन्तु फिर भी उनके साथ एक इतिहास सम्बद्ध है। रासो तो हिन्दी साहित्य का आदि महाकाव्य हैँ इसके समस्त पानों को ऐतिहासिक प्रन्‍्थों में खोजना भारी भूल होगी तत्कालीत मुसलमानों में ही इतिहास लिखने की प्रथा थी, वह पक्षपात के कारण हिन्दुओं की उपेक्षा तथा मपने आश्रयदाता मुसलमान शासकों की अतिशयोकक्‍्ित पूर्ण प्रशंसा किया करते थे यह भी अत्युक्ति होगी कि प्रायः वह अपने इस प्रकार के ग्रन्थों द्वारा विपक्षियों के विषय में भ्रास्ति पूर्ण प्रचार ही अधिक करते थे ऐसी पक्षपात॒ पूर्ण स्थिति में उनके भ्रन्थों में कुछ प्रामाणिक सामग्री खोजना मृग-तुषणां के अतिरिक्त कुछ नहीं | फिर भी पात्रों के विषय में अधिक से अधिक प्रामाणिक एवं ऐतिहासिक सामग्री जुटाने का प्रयत्व किया गया है। वास्तविकता यह है कि बिना मूल रासो का पता लगाए हुए, उसके पात्रों के विषय में भो अधिकार पूर्ण एवं प्रामाणिक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है रासो में अत्यधिक क्षेपक होने के कारण घहुत से काल्पनिक नामों का भी समावेश हो गया है, जिसके कारण ऐतिहासिक पापों का विवरण भी विकृत होकर रह गया है। ऐस्वी विषम स्थिति से पात्रों का वास्तविक मूल्यॉकन फरना अत्यन्त कठिन है, फिर भी लेखक का यही प्रयत्न रहा है कि रासो के पात्रों का घास्तविक स्वरूप पाठकों के समक्ष रक्खा जा सके

इस प्रबन्ध लेखन-काल में अन्‍य अनेक महानुभावों से समय-समय पर वहुमूल्य चुझाव

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प्राप्त होते रहे, उन सभी के प्रति लेखक हृदय से आभार मानता है। सर्व प्रथम लेखक हनदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के रीडर तथा हिन्दी विभाग, ब्रेंडोद। विश्वविद्यालय के अध्यक्ष स्वर्गीय ड्रॉ० विपिनविहारी त्रिवेदी के प्रति अपनी हादिक कृतज्ञता प्रकट करता है, जिनके स्नेह पूर्ण पथ प्रदर्शन एवं सतत प्रोत्साहन से ही यह काय॑ पूर्ण हो सका। प्रस्तुत कृति में प्रकाशित पृथ्वीराज चौहान तथा चन्दवरदायी के चित्र लेखक को उन्हों से प्राप्त हुए थे इसके अतिरिक्त वह सर्व क्षी मुनिराज जिनविजय डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ० दशरथ शर्मा, डॉ० माताप्रसादगुप्त, डॉ० केसरीनारायण शुक्ल अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, डॉ० भगी रथ मिश्र तथा डॉ० सरयूप्रसाद अग्रवाल का भी क्वनन्न हैँ, जिन्होंने अपने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष सुन्नावों से प्रस्तुत प्रवन्ध को अधिकाधिक सारगर्भित बनाने में हाथ बटाया हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ० दीनदयालु जी गुप्त का लेखक हृदय से ऋणी हैं, जिनकी सदभावना उसे सर्देव उपलब्ध रही हैं। मैं अपने अग्नज एवं सहयोगी डॉ० प्रेमनारायण टण्डन तथा डॉ प्रभाकर शुक्ल का भी अत्यन्त आभारी हो जिन्‍्होंने प्रवन्ध के प्रकाशन में पग्-पग पर प्रेरणा तथा सभी प्रकार की सहायता एवं सुविधा प्रदान की हूँ

“ऊेण्णचन्द्र अग्रवाल

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संक्षिप्त रूप

उदयपुर संस्करण

उदाहरणार्े

एनल्स आव दि भंडारकर भोरियंटल रिसच इंस्टिट्यूट। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा

छ्न्द

जनेल आव दि रायल एश्यरिटिक सोसाइटी वाम्वे प्रांच जनंल आव दि रायल एशियाटिक सोसाइटी लंदन जनेल आव दि रायल एशियाटिक सोसाइटी बंगाल डॉक्टर

घारणोज

नागरी प्रचारिणी पत्रिका

नागरी प्रचारिणी सभा

नागरी प्रचारिणी संस्करण

पृष्ठ

पृथ्वी राज रासो

महामहो पाध्याय

रायल एशियाटिक सोसाइटी लन्दन।

समय

--- साहित्य संस्थान उदयपुर

राजपूत : शब्द तथा इतिहास

राजपूताने में यों तो अनेक छोटी-बड़ी जातियाँ हैं किन्तु जो स्थान वहाँ राजपूतों को प्राप्त है वह अन्य को नहीं राजपूत 'शासक' जाति है। प्रमादवरश चाहे कोई इन्हें हृण, तुर्क, यूनानी, शक्र आदि अनारयों की-जिन्होंने भारतवर्ष में आकर हिन्दू धर्म तथा सभ्यता को ग्रहण कर लिया था-सन्तान लिख दें, किन्तु यह शुद्ध आये नस्ल के प्राचीन क्षत्रियों के ही वंशज हैं प्राचीन काल में इस जाति का प्रभृत्व केवल उत्तर भारत में, अपितु दक्षिण भारत में भी था, किन्तु अब इनकी प्रधानता केवल राजपूताने में ही रह गई है

'राजपूत' शब्द एक जाति या वर्ण-विशेष के लिए मुसलमानों के इस देश में आने के उपरान्त प्रचलित हुआ है। यह शब्द संस्कृत के 'राजपुन्र! का अपभ्रश रूप है। आदि काल में 'राजपुत्र' शब्द किसी जाति विशेष के लिए प्रयुक्त नहीं होता था, अपितु यह शब्द क्षत्रिय राजकुमारों अथवा राजवंशियों का सूचक था | इसका एक मान्न कारण यह था कि आादि काल से ही भारतवषं क्षत्रियों के आधीन था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र”! कालिदास फे काव्य भर नाटकों", अश्वंघोष के ग्रन्थों, महाकवि वाणभट्ट के प्रसिद्ध ग्रन्ध 'हपंचरित' तथा 'कादम्बरी"

१. जन्मप्रभृति राजपुत्नानृक्षेत्‌ कर्कटफसघर्माणोहिजनकर्मक्षा: राजपुत्रा:

-अर्थंशास्त्र पृ० ३२

राजसूयदी क्षितेन मया राजपुत्रशतपरियृ्‌ वसुमित्र॑ ग्रोप्तारमादिश्य

>मालविकास्तिमिन्न अंक ४, १० १०४

३. अथ तेजस्विसदन तपः क्षेत्रं तमाश्रयम्‌

केचिदिक्वाकर्दी जग्भू राजपुत्रा विवत्सव: ॥८॥ --सौन्दरानन्द काव्य, सर्ग १॥

४. केसरिकिशोरकेरिव विक्रमंकरसेरपि विनयव्यवहारिपिरात्मन: प्रति-

बिम्बरिव राजपुत्रो: सह रसमाणः प्रथमे वयसि सुखमतिचिंरमुवारू

“-फादम्बरो, पू० १४-१५।

रे

[२ ]

बादि पुस्तकों एवं प्राचीन शिलालेखों' तथा दानपत्रों' में राजकुमारों और राजधराने के अन्य व्यक्तियों के लिए 'राजपुत्र' शब्द का प्रयोग हुआ है चीमी यात्री ह्व नसांग ने वि० सं० ६८६ से ७०२ (६२९-६४५ ई०) तक भ।रतवर्प का भ्रमण किया तथा अपनी यात्रा का विस्तृत वर्णन लिखा उस वर्णन में तत्कालीन युग के भूगोल, इतिहास, धर्म, रहन-सहन आदि का बड़ा ही महत्वपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया गया है। अपने ग्रन्थ में उसने कई स्थानों पर राजाओं का तामोल्लेख कर उनको क्षत्रिय' ही लिखा है और राजपूत' शब्द का प्रयोग कहीं भी नहीं किया अतः स्पष्ट है कि छू नसांग के समय तक क्षत्रियों को राजपुत कहने का प्रचार हुआ था। मुसलमानों के शासनकाल में क्षत्रियों के राज्य क्रशः तिरोहित होते गए तथा बचे खुचों को उनकी आधीनता स्वीकार करनी पड़ी अर्थात्‌ वह स्वतत्र राजा रह कर मुसलमानों के सामन्‍्त बन गए ऐसे अवसर पर राजवंशी होने के कारण उनके लिए “राजपूत! शब्द का प्रयोग होने लगा कालान्तर में शरनेः शर्ने: यदहो शब्द जातिसूचक बन कर जन साधारण में प्रचार पा गया

क्षत्रिय वर्ण भारतवर्ष पर वैदिक काल से शासन कर रहा था और आर्यों की वर्ण व्यवस्था के अनुसार प्रजा का रक्षण करना, दान देना, यज्ञ करना, बेदादि शास्त्रों का अध्ययन करना तथा विपयासक्ति में पड़ना आदि क्षत्रियों के मुख्य धर्म माने जाते थे ।' मुसलमानों के भारत में आने के उपरान्त से यही क्षत्रिय जाति 'राजपूत” कहलाने लगी

राजपूत सुडौल, कद्दावर तथा पौरुपवान होते हैं इनमें दाढ़ी रखने का भाम रिवाज है। प्रायः यह सीधे-सादे तथा मिलनसार प्रवृत्ति के हुआ करते हैं। राजपूत अपनी स्त्री का बड़ा सम्मान करते हैं। वह अपनी मर्यादा के लिए हर समय अपनी जान हथेली पर रक्खे रहते हैं राजपू््तों के अपने देश, जाति तथा मान-मर्यादा की रक्षा करने के लिए कंसरिया

« मालिमाप्प्रभुतिग्रामेषु संतिष्ठमानश्री प्रतीहारवशीय सब्वेराजपुर्न॑श्त “-आदबू पर तेजपाल के मंदिर का वि० सं० १२८७ का शिलालेख, एु० इ० जि० ८+ पु० २२२

न्ग0

२. सब्यनिव राजराजनकराजपुत्रराजामसात्यसेनापति नलाखिमपुर से मिला हुआ राजा: घर्ंपाल का दानपत्र, ए० इ० जि०८, पृ० २४९। ३. द्लनत्सांग ने महाराष्ट्र के राजा पुलकेशी वलमभी के राजा प्ू चपट ( प्र वभट ) आदि कई राजाओं को क्षत्रिय हो लिखा है। वि० बु० रे० चे० व० जि० २, पृ० ६४५६-६७ ४. “पृय्वीराज रासो' में रजपुत (राजपुत) शब्द मिलता है- लग्गो सुजाय रजपुूत्त सीस घायो सुतेग करि फरियरीस | पृ० रा०, पृ० २५०८७, नागरी प्रचारिणी सभा काशी ! ५. प्रजानां रक्षणं दानमिन्याष्ययनमेव लव विषयेष्वप्रसक्तितश्च क्षत्रियत्य समासत्ः मनुस्मृति ११०९ ॥॥

६. के |

वाना रण कर शात्नर्‌ू के साथ मर मिटने के अनेक उदाहरण प्रसिद्ध हैं। इस वीरोचित भाव को देखकर ही वीर कवि सूर्यमल्ल मिश्रण ने वीर सतसई में लिखा है--

हूं बलिहारी रानियां जाया वंश छत्ोस सेर सलूनो चुन ले, मोल समप्प॑ं सीस १०० ॥॥

अर्थात्‌ हे राजपूत क्षन्नाणियों ) तुम घन्‍्य हो जिनकी कोख से यह ३६ वंश उत्पन्न हुए हैं जो वीर सुधुत्र सेर भर आठा लेकर अर्थात्‌ उदर पालनार्थ अत्यन्त अल्प वेतन लेकर भो अपना सब्र कुछ समर्पण करन को सदा तत्पर रहते हैं तथा रणक्षेत्र में सदा अपना सिर हथेली पर रक्‍्खे रहते हैं

प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टॉड ने राजपूत जाति का चित्रण करते हुए लिखा है-- महान शूरता, देशभक्ति, स्वामिधमं, प्रतिष्ठा, अतिथि सत्कार तथा सरलता, यह गुण सर्वाश में राजपुतों में प्राप्त होते हैं!"

यही नहों, प्रसिद्ध मुगल सम्राट अकवर के प्रधान मंत्री मौलवी बबुलफ़ज्ल ने भी राजपूरों को अशसा इस प्रकार की है-विपात्तिकाल में राजपूतों का असली चरित्र जाज्वल्य- सान प्रकाोशत होता है | राजपूत सेनिक रणक्षेत्र से भागना जानते ही नहीं हैं, वल्कि जब भी युद्ध की दशा सन्देहजनक हो जाती है तब वे लोग अपने घोड़ों से उतर जाते हैं और शूर- वरत के साथ अपन प्राण न्यौछावर कर देते हैं

अंग्रेजी यात्री वरनियर भी अपनी 'भारत यात्रा! पुस्तक में लिखता है कि राजपूत. लोग जब युद्ध क्षत्र में जाते हैं तव भापस में गले मिलते हैं गोया उन्होंने मरने का पूरा निश्चय कर लिया है। स्पार्टा देश (योरप) के वीर लोग भी ऐसे अवसरों पर अपने वाल सुलझ्ाते थे इसी प्रकार राजपूत लोग केसरिया कसूमल वाना पहिनते थे ऐसं। वीरता के उदाहरण ससार की अन्य जातियों में कहाँ पाये जाते हैं! किस देश और जाति ने.इस अकार को सभ्यता, साहस और अपने पूर्वजों के रिवाजों को इतनी शताब्दियों तक अनेक संकट सहते हुए कायम रखा है ।*

राजपूतों की वीरता से प्रभावित होकर विदेशियों ने भी उनकी प्रशसा की ओर भारतीय काव्यों में भी इनकी वीरता का मुक्तकंठ से गान किया गया है-रासो ऐसा ही काव्य है-मुख्यतः रासो युद्ध-प्रधान कण्ठप होने के कारण इसमें उस समय की आदडें वीरता का चित्रण मिलता है। डॉ० विपिनविहारी त्रिवेदी ने भी इनकी वीरता से प्रभावित होकर लिखा है-क्ष।त्र धर्म और स्वामि-धर्म निरूपण करने वाले इस काव्य में तेजस्वी क्षत्रिय वीरों के युद्धोत्वाह तथा तुमुल नाद और वेजोड़ युद्ध दर्शनीय है असार-संसार यश की श्रेप्ठता और

.. नह ००ण०९९, 9०प्रंणांशा, ॥0एथे६9, ध०्मणण, वष्णूअंफ्ा।ए ग्यत अंग्रजॉति0 276 चुष्धांप९5 एटा ग्रए५ 2००४ 76 एणा०्टवै८ए ६० पीला. --रिशुुं४87 9. 78.

(5 2]

प्रघानता को दृध्टिगत करके उसकी प्राप्ति स्वामि-धर्म पालन में निहित की गई है। स्वामि-

धर्म की अनुवतिता का बर्थ है प्रतिपक्षी से युद्ध में तिल-तिल करके कट जाना, परन्तु मुह

मोड़ना इस प्रकार स्वामि-घधर्म में शरीर नष्ट होने की वात को भौण रूप देकर यश सिरमौर

कर दिया गया है; भौर भी एक महान प्रलोभन तथा इस संसार और सांसारिक वस्तुओं से

भी अधिक आकर्षक मित्र-लोक वास तथा अनन्य सुन्दरी - अप्सराओं की प्राप्ति हे धर्मभीर

ओर त्यागी योद्धा के लिए शिव की मुण्डमाला में उसका सिर पोहे जाने तथा तुरन्त मुवित

प्राप्ति आदि की व्यवस्था है ।/? पृथ्वीराज रासो इसी प्रकार की भावनामों से ओत-प्रोत है

एक स्थान पर डॉ० त्रिवेदी वीरों के अनुशासन तथा स्वामि-धर्मं के विपय में लिखते है कि 'उस युग की वीरता का यह आदर्श कि स्वामि-ध्रमं ही प्रधान है, कोरा आदर्श मात्र था।

उसका संस्थापन सेना की सामूहिक दृढ़ता गौर स्थायित्व तथा विशेषरूप से उसकी युद्धोचित

प्रवृत्ति की जागरूकता को ध्यान में रखते हुए अति आवश्यक अनुशासन (0:८[!7८)

को लेकर हुआ था अनुशासन ही सेना और युद्ध की प्रथम आवश्यकता है। आदि काल से

लेकर आज तक सेना मे अनुशासन की दृढ़ता रखने के लिए नाना प्रकार के नियमों का

विघान पाया जाता है यहाँ आज्ञाकारिता को दासता से जोड़ना ठीक नहीं है क्योंकि उस

युग में किराए के टट॒टुओनों (/८८८४०77८5) से भारतीय सम्राटों की सेनाए नहीं सजाई

जाती थीं | युद्ध क्षत्रियों का व्यवसाय था और स्वामि-धम्म हेतु प्राणोत्सर्ग करना उनका कतंव्य

था यहाँ दासता ओर घन के लोभ का प्रश्व उठाना तत्कालीन वीरयुग की भावना को

समझने में भूल करना है सम्राट या सेनापति की आज्ञापालन के अनुशासन को चिरस्थायी भौर ब्रतस्वरूप बनाने के लिए स्वामि-धर्म का इतना उत्कट प्रचार किया गया था कि वह सामान्य सैनिकों की नसों में कूट-कूट कर भर गया था गौर इसी भादर्श की रक्षा में उनके कट मरने का कार्य दुहाई दे रहा है | दार्शनिक जामा पहने हुए स्वामि-धर्म योद्धा का परम माभूपण बा ।*

इस प्रकार के वातावरण में पल्ते हुए वीर क्षत्रियों की वृत्ति असार-संसार में यश को अमरता तथा स्वामि-धर्म के प्रति सजग हो जाती होगी तभी तो इन योद्धाओों के लिए युद्ध अनिवंचनीय आनंद के क्षण उपस्थित करदा है युद्ध-क्षेत्र में तिल-त्तिल कर-मर मिटने वाले क्षत्रियों के उद्गार कितने प्रभावशाली हैं, साथ ही इनके वीरोचित उत्साह को देखकर हैरान होना पड़ता है-

(१९). मरना जाना हवक हैं। जुग्ग रहेगो गल्हां। सा पुरुसाँ का जीवन थोड़ाई है' भक्लां

१. रेवातट, भूमिका भाग, पु० २० २. वही, पुृ० २०-२१॥

[ * ]

(२) जाणणी जणण बार वार थिर रहे काया | सापुरसां का जीवणा थोड़ा ही फुरभाया (३) जीविते सभ्यते लक्ष्मी मृते चापि सुरांगणा। -क्षणे विध्चंसिनी काया का चिन्ता मरणे रणें (४). जीवंतह की रति सुलभ मरन अपच्छर हूर दो हथान लड्डू उमले | न्याय करें वर सूर करीब ७०० वर्षों से उत्तरीय भारत को जनता का कण्ठहार जगनिक विरचित 'बाल्हा खण्ड' भी ऐसी ही भावनाओं से ओतप्रोत है।

उस समय के राजपूत योद्धा जैसे वीर थे वैसी ही धीरता से परिपूर्ण उनकी पत्नियाँ, माताएं, बहनें तथा वेटियाँ भी थीं। अपभ्र श-साहित्य ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है यदि शत्रु की सेना परास्त हो गई है तो निश्चय ही उसके पति के द्वारा और यदि पति फी सेना भग्न हुई है तो निश्चय ही मेरा पत्ति युद्ध भूमि में मारा गया है कितना दृढ़ विश्वास है उसे अपने पति की घीरता पर-- जप्द भग्गा पारबकड़ा तो सहि मज्मु पिएण महु भग्गा अम्हहं . तणा तो तें मारिअडेण ॥* और भी, पीररागना को अपने पति फी मृत्यु पर शोक के स्थान पर हर्ष अधिक होता है वह अपनी प्रिय सखी से कहती है कि-हे बहिन ! अच्छा हुआ, थदि मेरा पत्ति युद्ध भूमि सें मारा गया। यदि वह भागा हुआ घर पर आता तो मैं समवयस्काओं ( सखियों ) में लजाती-- भलला हुआ जु मारिआ बहिणि महारा कंतु लज्जेज्जतु वयंसिअहु जद भग्गा घर एतु।' रमणियाँ कायर पति को युद्ध-भूमि से भागने पर मरा हुआ ही -समझती हैं उनके जीवित रहने पर भी श्वगार भहीं करतों, विधवाओं का वेप घारण किए रहती हैं। एक चीरांगना, मनिहारी से जो उसे चूड़ियाँ पहनाने भाई है, फहती है-हे सखि सनिहारिन * चली जा, फिर इस मकान पर आता पति मरे हुए घर आआा गए हैं (युद्ध से भाग कर आना .. मरण तुल्य है) फिर मुझ जैसी विधवाओं के -लिए गार कंसा-- सणिहारी जा री सद्यी ,,अब - हवेली: आवब पीव मुवा घर आबिया , विधवा किसा बर्ताव ॥'

१. हेमचन्द्र, सिद्ध हेमशब्दासुशात्तनम्‌, ११४। २. वही, ९२ ३... वियोगी हरि, वीर सतसई,

[ & . ]

और भी-उस पुत्र की उत्पत्ति से क्या लाभ तथा मृत्यु से क्‍या हानि जिसके पिता की भूमि दूसरे से आक्रान्त हो अर्थात्‌ दूसरे द्वारा अपहरण कर ली गई हो-यह है उस समय की वीर माता की उक्तियाँ- करे पुत्ते जाएं कवणु गुण अवगुणु कवणु मुएण जा बप्पी की मुहंडी चम्पिज्जद अवरेण ॥" इसी प्रकार की उक्ति राजस्थानी कवि सूर्यमल्ल मिश्रण ने भी प्रस्तुत की है वीर माता अपने कायर पुत्र को रणभूमि से भागा हुआ देखकर उसे सम्बोधित करते हुए कहती है- हां पुत्र ! आयु क्षीण कराने वाला स्तन पान कराके जब महाकष्ट से तेरा पालन-पोषण किया था तब मैंने यह नहीं जाना था कि तू अपनी जननी का दूध लजा कर खड़ा होगा पूत महा दुख पालियो बय खोबण थन पाय एम जाएयो आवही, जायण दूध लजाय ॥* इसी प्रकार के विचार महाकवि भत हरि ने अपने “वेराग्य शतक' तथा श्री वियोगी हरि जी ने वीर सतसई में व्यक्त किए हैं यहाँ पर उन्हें क्रमशः उद्धुत किया जाता है-- मा: तु केवलमेवयोवनवनच्छेदे कुठारा वयम्‌। कह्यौमाय. भुख चूमिक कर गहाय करवाल जनि लजवयों बृध मो परयोधरनु कौ लाल जणणी जणे कपुत मत, चंगो जोंवन खोय जण तू बेर विहड़णों, के कुलमडंण होय ।॥' उसी युग की रमणियाँ ही गोरी से वर मांग सकती हैं कि इस जन्म में तथा अन्य जस्मों में भी हमें ऐसा पति देना जो अंकुशों द्वारा व्यक्त मदांध हाथियों से हँसता हुआ भिड़ जावे- मार्याह जार्माह अन्नहिं वि गीरि सु दिज्जहि कनन्‍्तु गय मत्तहें चत्तद्ू सहूं जो अब्मिडई हसन्तु ।* और भी, युद्ध-मदिरा में झूमता हुआ वीर क्षत्रिय योद्धा उस प्रिय देश को जाना चाहता है जहाँ खड़्ग के खरीदार हैं, रण के दुर्भिक्ष ने उसे भग्न कर रक्‍्खा है और बिना जूझे हुए वह रह नहीं सकता-

खग्ग विसाहिड जहि लहहु पिय तहि देसहि जाहूं॥ रण दुबव्भिकर्खे भग्गाइ . विणु जुज्में बलाहुं १. हेमचन्द्र, सिद्धहेमशब्दानुशासन, १२९ वियोगी हरि, घीर सतसतई, ११५१ ३. बही; छं० ८७ ४. हेमचन्द्र, सिद्धहेमशब्दातुशासन; रेघरे ४. बही; र२८६॥

(8:-

अंत में डा० तिवेदी के शैब्दों में 'जाति गौरव के लिए निजी हित्त-अहित की अवमानना फरने वाले, भारतीय मान-मर्यादा के रक्षक, हिन्दू-शासन का आदशे रूप से पालन करने वाले, प्राचीन संस्कृति के पोषक राजपूत योद्धाओं ने शत्रुओं को पीठ नहीं दिखाई, जातीय सम्मान के लिए प्राण होम दिए, वचन का निर्वाह किया, सब कुछ उत्सर्ग करके शरणागत की रक्षा की, निशशस्त्र, आहत, निरीह और पलायन करने वाले शत्रु पर हाथ नहीं उठाया, धोखा नहीं दिया, प्रतारणा नहों की, झूठ वहीं बोले, विश्वासधात नहीं किया, और युद्ध में स्प्री-बच्चों पर हाथ नहीं उठाया वे-मिट गए, उन्तके विशाल सःम्राज्य घ्वस्त हो गए परन्तु राजपूती आन, बान और शान भारतीय इतिहास में सदा के लिए स्वर्णाक्षरों में लिख गई ।'

शजपूर्तों के ३६ वंश तथा उनका इतिहास

राजपूर्तों के चार वंश त्तथा मनेक राजकुल अथव, राजवंश मिलते हैं, किन्तु मुख्य राजकुल (८७०) १६ ही हैं जो प्रायः राजपूताने पाए जाते हूँ। कवि चंद वरदाई विरचित “पृथ्वीराज रासो” सें श्री हमें ३६ राजकुल होने की सूचना श्राप्त होती है-

रवि ससि जादवबंश, ककुथ परमार स्‌ तोमर चाहुधान चालकुक, छंव सीलार अभीवर दोय मंत्त (दोपंभत) मकचान, गरुम गोहिल गोहिलपुत 9 चापोरफटत परिहार, राव राठोर रोसजुत॥। देवरा टांक सैधब अनिर्ग (अनग ) यौतिक प्रतिहार दधिपट्‌ कारदुपाल कोटपाल हुब | हरितट गोर कला (मा) भट घत्य (घान्य) पालक निकुंभचर। राजपाल कवि मोस फालच्छुरक॑ आदि दे बरते वंश छत्तीत ॥*

घिक्रम सभ्वर्त की १९ वीं शताछ्दो में काश्मीरी पं० कल्हण ने राजतरंगिणी नामक पफ्ाश्मीर फा इत्तिहास' लिखा था उसके ७वें त्तरंग से एक इलोक से ज्ञात होता है कि उस समय भी क्षत्रिथों के ३६ कुल सभझे जाते थे ।' आज भी राजपूताने में राजवंशों के विषय में एक प्राचीन लोकोक्सि प्रचलित है फि+

दस रंवियों दस चन्द फो द्वादंस ऋषि प्रमांणें चार हुतासन से भये वंश छंत्तीस बखान

१. रेबातद, भुमिका भाग॑ १० रे३। २. पथ्वीराज रासो, सभा संस्करण, छं० २७७ रू० परेश-रे रे ३... प्रस्यापेयन्तः समृति षटठनिशति कुनेण्ये |

ज्लेज ध्विनों भास्वतोषि सहस्ते नोधकेः शिशितियः ॥१६%७॥

[ ८5 ]

किन्तु समस्या तव उत्पन्त होती है जब इतिहास में विभिन्न स्थानों पर एक ही वंश के सूर्य, चन्द्र अथवा अग्नि स्ले उत्पन्न होने की कथा मिलती हैं। संभवत: यह सब झमेला पौराणिक-कथाओं के अनुकरण के कारण ही उत्पन्न हुआ होगा ।.

एक और. . वंशावली वि० सं० १९७० ( ई०सं० १९१३ ) में बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के उपाध्यक्ष महापहोपाध्याय पं० हरप्रसाद शास्त्री को जोघपुर में मिली थी", | जो प्राय: एक शताब्दी पूर्व वघेलखण्ड में मिली हुई बताई जाती है | वंशावली इस प्रकार हैं-

चन्द्रवंशी-- (१) यादव (२) गौड़ | (३) कावा। (४) कौरव (चंदेल) | (५) भाटी (६) केवरा | (७) तंवर | (८) सोरठा। (९) कटारिया | (१०) सोमवंशी

ऋषिवंशी-(१) सेंगर (२) गौतम | (३) विसेन (४) चमर गौड़ (५) ब्रह्मनगौड़ | (६) मट गौड़। (७) राजगौड़ (८) दीन दीक्षित (९) दीक्षित (१०) विलकेता। (११) विलखरिया (१२) कनपुंरिया।

यज्ञवंशी (अग्निवंशी)-(१) पड़िहार (२) सोलंकी (३) प्रमार (४) चौहान

सूर्यवंशी--(१) गोहिल (सिसोदिया)। (२) सिकरवार। (३) गड़गूजर (४) कछवाह। (५) बनाफर | (६) गहरवार (राठोड़, वर डेल, वुन्देल) (७) व्घेल (5५) सरनेत (९) निकुंभ। (१०) छीड़ो |

आजमगढ़ के स्वर्गीय राजा रणजोरसिह विरचित "क्षत्रकुल वंशावली' में ३६ राज- वंशों का उल्लेख निम्न प्रकार से किया गया है- |

सुयंबंशी-- (१) सूर्यवंशी (२) रघुवशी (३) दागी (४) कछवाहा। (५) चड़गूजर (६) सरस्वार (७) दिखत (5) सिरनेत (९) सीसादिया | (१०) गृहंवार (वर्देला) (११) करछुली (१२) वोदा। (१३) कन्नोजिया (१४) विलकंत | (१५/ चंवरगौर (१६) राठौर |

चंद्रवंशी--(१) गहरवार (बुन्देलों से भिन्न)। (२) चन्देल | (३) सोमवशी (४ तौर नागवंशी-(१) पायक (२) वेस

ऋषिवंश्षी-(१) गौतम (२) सेंगर (३) विसेन |

अग्निवंशी-(१) चोहान (२) सुलंकी (३) नाहर (३) व्घेल। (५) गुहोलत

(६) नदवान (७) खागर। (८) परहार (९) पमार (१०) खडेत (११) भदौरी | राजा रणजोर सिंह ने एक छठवाँ वंश असुर (दैत्य) वंश माना है--

देत्यवंशो-(१) निकुंभ (२) निवार | (३) कटोच (४) कटियार (१) अमेठिया (६) काठो। (७) जेठवा | (5) ठोठ। (९) सिकरवार | (१०) दहिमा। (११) मोहिल |

.. कत्गांगांगवए छ९ए०ए०४ ०7 पाल ठएच्तबघ०्प बंध 5०बणटा जी (59 एग्तांट दाता टो& 3923, ?926 2-22.

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३६ राजवंशों की पाचवीं तालिका हेमचन्द्र कृत कुमारपाल चरित (सं० १२१७ वि० ) में दी हुई है-(१) इक्ष्वाकु (२) सोम (३) यदु (४) परमार। (५) चौहान। (६) चालुक्य (७) छिन्दक (८5) सिलार (राजतिलक) (९) चापोटकट (१०) प्रतिहार (११) करक (१२) कूरपाल (कूपंट) | (१३) चन्देल। (१४) मोहिल | (१५) पौलिक (१६) मोदी (१७) धान्यपालक (१८) दहिमा (१९) तुरुन्दलीक (२०) निकुम्प (२१) हुण | (२२) हरियड़ | (२३) मोरवर (२४) पौरवर (२५) सूर्य |(२६) सँधव (२७) चदुक | (२८) राट। (२९) शक (३०) करट। (३१) पाल। (३२) वाउल। (३२) चदुयाणक | (३४) अभंग (३५) नठट (जट) (३६) राज्यपालक

छठ्वीं वंशावली, कनेल टॉड कृत राजस्थान” ( प्रथम भाग ) में मिलती है। उसमें ३६ राजवशों' का उल्लेख इस प्रकार हुआ है-(१) सूर्य (२) चन्द्र (३) गहलोत (४) यदु (५) तवर (६) राठोर | (७) कछवाहा (5) पंवार। (९) चौहान (१०) सोलंकी (११) परिहार | (१२) चाबवड़ा (१३ टांक (१४) जाट (१५) हुण (१६) काठी (१७) वलल्‍ला। (१८) झाला। (१९) जेंठण (२०) गोहिल (२१) सरवेगा। (२२) सिलार (२३) डाभी (२४) गौड़ (२५) डोड | (२६) गहरवार | (२७) बड़गूजर (२८) सेंगर (२९) सिकरवार (३०) वैंस (३१) दहिमा | (३२) जोहिया (३३) मोहिल (३४) निकुम्भ (३५) राजपाली (३६) दाहिमा। इनके अतिरिक्त (३७) हुल तथा (३२८) डाहरिया

प्रसिद्ध इतिहासकार श्री जगदीशासह गहलोत क्षत्रियों के ३६ राजवंशों के विपय में अपना मत इस प्रकार निर्धारित करते है--'तुलना गौर खोज करते हुए पूर्व पश्चिम के ३६ राजवंशों का समावेश किया है। जिसका आधार पुरानी पुस्तकें वयोवृद्ध जानकर लोग और दन्त कथाएं हैं। इन ३६ राजवशों के सिवाय अन्य भी कई राजवंश हुए होंगे परन्तु क्योंकि इससे अधिक संख्या लोक प्रसिद्ध नहीं है। इसलिए हम भी छत्तीस संख्या परिमित रखते हैं। हमारी सम्मति में वास्तव में नामावली इस प्रकार होनी चाहिए--

सुयंबशी-(१) गहलौत (२) कछवाहा (३) राठोड़ (४) बड़गूजर (५) निक्रुम्थ (६). केठेरिया काठी (७) मौर्यवस (८५) जोहिया

चन्द्रवंशी - (१) यादव (२) गौड़ (३) तंवर (४) नागवशी (५) झाला। (६) कलचुरी ( हैहय वंशी ) (७) मौखरी (गुप्तवंशी ) (८5) कटोच (९) पलवार (१०) अग्निवशी (११) परमार (१२) चौहान (१३) सोलकी (१४) पडिहार |

ऋषिवशी--(१) पडिहारिया ( देवल आदि ) (२) सेंगर (३) दाहिमा। मी 2 अपन पट [.,.. #॥78)5 87वें श्रिगरपंवुपपंद रण रिश्युंवडा97, 07 पीर एटाफथों ब्यत एल्डएटाए रिशुएपा 59065 0 शतवा[23-०9ए, [धग85 ३00 . एब86 80, ए0 4, #फााक्रव्त फ़ए 5ग्रांपा, छ]067 & ००, 65, (४०४7॥. 829, 7,07609-

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(४) गौतम (५) उदयनिया। (६) वाण | (७) पल्‍लव (८) गर्ग (९) दईया। (१०) भुगवंशी | (११) जेठवा (१२) कदम्व

इतना ही नहीं लोकोक्तियों में भी राजपूतरों के ३६ वंश ही प्रचलित हैं। वीर रसावतार महाकवि सूर्यमल मिश्रंग विरचित 'बीर संतसई' के निम्न छन्‍्द से भी राजपूतों के ३६ वंश' होना ही प्रकठ होता है

हूँ वलिहारी राणियाँ जाया वंस छतीस | चून सलूणों सेर ले, मोल समप्ये सीस ॥१००। वीर सतसई के सम्पादक त्रय ने अपनी टिप्पणी में ३६ वंश इस प्रकार गिमाएं हैं ।* (१) झाला (२) हाला (३) ऊभंट (४) बाघेला (५) सरवहिया | (६) सोलंकी (७) मौलिह। (5) मांगलिया। (९) राठौड़ | (१०) चावड़ा | (११) दहया। डावी (१३) बला (१४) गौड़ (१५) सीसोदिया। १६) टाक। (१७) चाहिल ! (१८) चाचिक | (१९) पहिहार (२०) वालेसा (२१) दाहिमां। (२२) सोनगरा (२३) वारड़ (२४) खींचीं। (२५) वरड़ा। (२६) बीरूपा (२७) कछवाहा। (२८) हाड़ा (२९) देवड़ा | (३०) जाडेचा (३१) परमार | (३२) सिकरवाल। (३३) भादी (३४) काठी (३५) तोमर भौर | (३६) चंन्देल

विभिन्‍न ग्रन्थों के आधार पर हमने राजवंशों कौ गिनाने का प्रयत्न किया है उपयु क्त समस्त ३६ वंशों का इतिहास का वर्णन करना यहाँ पर अप्रासंगिक होगा, अ्रतः प्रमुख