जिनदशंन प्रतिष्ठान म्रन्थ क्रमांक

जन मन्दिरोके ज्ञान भण्डार + 178०9 ए91वहा25,० 19108 व्यप ८छ

जोधपुर 407तारातार हस्तलिखित ग्रन्थो का प्रता 14915018 सूची पत्र ^7^1.00ह प्रथम खण्ड | ४०. 1

न्‌ ~ कतन्चता ज्ञापन ~

भारत सरकार के राष्टीय भ्रभिलेखागार ने इस सूची पचक सूद्रण व्यय कौ 75 राशि के श्रनुदान की स्वीकृति प्रदान की है जिस कारण इसका मूल्य लागत का चौथाई मत्र ही, रला है 55

(त समप - राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर के प्रथम निदेशक स्वर्गीय पुरातत्त्वाचाये मुनि श्री जिनविजयजी को सर्मापितत जिन्होंने पूरे जीवन पयन्त पुरातत्त्व की श्रथक सेवा की

सेफलन कर्ता ; ८०71९ ए» :- कायकर््तागण : 11119165 9 सेदा मंदिर शवरी, जोधपुर 56५३ [0शाता- ९००६, 400 ्ए८प् 342 024 >+ 342 024

. राजस्थान (भारत) २९}881120, 10012

भाग | विभाग |

-- विषय सूची -

विवरण

(1) जंनम्रागम :-

(ग्र)

{आरा}

प्रग सूत्र. प्राचाराद्ध

सूत्र कृताद्ध

स्थानाद्ध

समवायाद्ध

व्याद्या प्रज्ञप्ति (भगवती)

ज्ञाताधमंकथाद्धु

उपासकदशाद्ध श्रन्तकृतदशाद्ध ग्रनृत्तरोपपातिकदशाद्ध

प्रष्न व्याकरण

विपाक

ग्रंग बाह्य सूत्र -

(1) उपाद्ध : प्रौपपातिक राजग्रए्नीय जीवाजोवामिगम प्रज्ञापना जब द्वीप प्रत्तप्ति चन्द्र प्रज्ञप्ति सूयं प्रज्ञप्ति निरियावलियादि पञ्चोपाद्ध

(1) ददसूत्र ` निशीथ हत्कल्ष व्यवहार दशाश्रूत स्कन्ध (कल्प सूत्र सह्‌) पचकल्प महातिणीष जीतकत्प

(111) चूलिका मूल ःनदी ग्रनुयोगद्वार दशवंकालिक उत्तराव्ययनं श्रोध निुक्ति

{1४} श्मावरयक्त सूत्र पाठः:

(४) प्रकीरणक :

{2) जेन सिद्धान्त श्राचार :-

(प्र) (प्रा)

ताचस्िक ्रौपदेश्चिक दार्यनिक म्पाय

4

83

॥१।

32

3)

(7,

राजकीय | प्रति विषय क्रम मद्या

15 20 1 1 {1 २4 29 २0 12 18 14 १4

13 21 11 17 14

८, ८८ + +<

६१ (1 +

279 82

1289 -+२

| पृष्ठ

20 22 24 2५ 26 28 28 28 30 39 30 30 4 ~+ 44 44 44 46 48 58 58& 79

176

प्रकाशक

वित्तरक

मुद्र

सस्करण

वप

प्रति

प्राकरि।

मूल्य

स्तक सेवा मदिर रावटी, जोधपुर 342 024

सत्मा्िष्य वितरणाकैद्र सेवा मन्दिर रावटौ, जोधपुर 342 024 (राजस्वान) भारत

राजनी प्रिन्टिगि प्रेस, नागौरी द्वार के अ्रन्दर जोधपुर 342 002

प्रयम प्रवेश

विक्रम संवत्‌ 2045, वीर सवत 2514, शक सवत्‌ 1910 ईस्वी सन्‌ 1988 500

552

रौपल ग्रोवटेव (20 > 30 ग्राठ पेजी)

₹० कागज (20 >८ 30 मेषलीथो 13 6 49) 37 रोम 8,000 कपौजिग दपाई परूफरीडिग 69 फर्मे 13 000 जिल्द वधाईवमाढा ताड 5 000

वलव्यय 26000

1 प्रति की लागत 5200 विक्रय मत्य चौयाई 1350 निवेदन

पुस्तक विक्र ता ग्रपना नका[खर्चा ्रतिरिक्त तेगा भराक्कयनमे दिये मञरत श्रवश्य पदे पृस्तक कमनतम प्रशुद्धियाकाशुद्धिपतरचपाहै।

इस पुत्तकपरकिसो मो प्रकार पि रका अधिकार प्रकाश्षक स्वावीन नही रखा है 1 भरचिकार्‌ प्रकाशक ने

5 प्रात्रता देखकर हौ पुस्तक दौ जावेगां

= + ¢> "~

° ब्राक्कयन 9

सेवामन्दिर जोधपुर के रावटी स्थित जिनदशंन प्रतिष्ठान हारा देश के इस भू-भाग मे श्राये जन ज्ञान भण्डारो मे श्रौर यत्र तत्र विखरे पड़ हस्तलिखित ग्रन्थो के बारेमे कु वर्षो सरे एकं परियोजना क्रियान्वित की जां रही है जिसके कतिपय पहलू निम्न प्रकार है--

(1) श्राघूनिकेढंगसे इन ग्रथों का पणं वीगत्तवार सूचीकरण श्रौर उन सूची प्रों का मुद्रण;

(आ) म्रन्थों का संग्रहण श्रौर मण्डारो का विलीनीकरणः;

(171) प्रतिप्राचीन, जीखं, प्रथम प्रादशे, श्न्यावचि श्रमृद्रित, दुलभ, सचित्र, भ्रत्यन्त शुद्ध संशोधित या प्रस्यथा महत्वपुणं ग्रन्थों का फोटु प्रतिविम्ब या फीट्मीकरणः;

(1४) ग्रन्थों के वे्ानिक ठंग से भण्डारीकरण एवं संरक्षण हेतु भ्रावष्यक सलाह्‌, सहायता साधन सामग्री का वितरण

इस परियोजना के प्रन्तर्गत श्रव तक निम्न ज्ञान मंडारो से लगभग एक हजार चार सौ हस्तलिखित ग्रन्य रावटीभण्डारमे भ्रा गये है--

(1) यशोसूरि केशरगणि ज्ञान भण्डार श्री महावीरजी जेन मन्दिर पुरानी मण्डी जोधपुर 833 प्रतियां

(1) श्री मुनिसुव्रत स्वामी जैन मन्दिर क्षेत्रपाल चन्रुतरा पुरानी मण्डी जोधपुर 317 प्रतियां (111) श्री तिवरी मन्दिरजी, श्री देवेन्द्र मुनि, श्री प्रकाशजी बाफणा भ्रन्यों से मेटक्रय 238 प्रतियां 19 129 86 4

योग 1388 प्रतियां

सूचीकरण सूची पतों के मुद्रण कायंक्रम के श्रन्तगेत प्रथम ग्रन्थ के रूप में जंस्तलमेरके पांच ज्ञान भण्डारों का सूचीपत्र मुद्रित होकर प्रकाशित किथाजारहाहै श्रौर द्वितीय ग्रन्यके रूपमे जोधपुर शहुरके निम्न जन मन्दिरो के ज्ञान भंडारों का यह्‌ सूचीपत्र तयार होकर प्रकाशित कियाजारहाहै।

सूचीपत्र मे स्रोत सकेत

(1) श्री कैशरियानाथजी मन्दिर दपतरियों का मोहत्ला मोती चौक जोधपुर के0-- (11) श्री चितामणि पाश्व॑नाथजी मन्दिर कोलड़ी, नवचौकिया जोधपुर को0-- (1) श्री करंथुनाथजी का मन्दिर सिधियो का मोदर्ला जोघपुर क्‌0-- (1४) श्री वद्धमान जन मन्दिर तीथं ग्रोसिया जिला जोधपुर ग्रो0-- तथा उपरोक्तानुसार रावटी मे स्थानन्तरित (४) श्री महावीर स्वामी मन्दिर पुरानी मण्डी जोधपुर म०- (छ) श्री मुनिसुव्रत स्वामी मन्दिर क्षेत्रपाल चलता पुरानी मण्डी जोधपुर मु०- (17) श्री सेवामन्दिर रावटी भण्डार के प्न्य ग्रन्थ से0--

इस सूची पत्रमे 7,350 ग्रन्यो का सूचीकदण किया गयाहै त्रौर जंसाकिि सूची प्रत्नके अ्रवलोपरन से स्पष्ट प्रयिकतर ग्रन्थ पन्द्रहुवी शताब्दी के वादकेहीदै। इसका कारणदै कि जोधपुर गहर विक्रम सवत्‌ 1516 मेही वराया गया वा ्रौर उसके वादहीये संडारस्वापित हवे दै! ग्रोसिया मन्दिर का भण्डार भी

4 2 - =-= मान | विभाग त्वरण ( जमो | 3} रजन मक्तिवक्रिया -- (ख) धामि विधि विधान प्रव-वरत काये 7 482 180 घ्रा) स्तवन स्तुति स्तानादि भक्ति सचना 1215 210 द) साप्रदायिक चण्डन मण्डन 121 276 (4) ऊन इतिहाग वृतान्त -- (ख) जीवन चरिन कथानकं 827 284 (प्रा) एतिहासिक भौगोतिक वब्नयदृतात 240 346 (5) अनितर धामिक - (ग्र) वैद 1 4 362 {द स्मृति 3 {5 362 (ई) इतिहास वपुराल 4 58 364 (उ) दशन व-याय 5 72 368 (ट) भक्ति (1 96 374 छि) ततर 9 14 380 (6) मत्र, तन्न, यन्व 11 297 382 2) साहित्यव भाषा - (प्र) कोन्यादि साहित्यिक ग्रय 12 354 400 (रा) व्याकर 13 273 426 (इ) शब्दको 14 19 444 (ई) दद, कान्य भापा शस 15 66 450 (उ) श्रलकरार 16 16 454 (8) भ्रायुरवेद (वेयक) -- 23 150 456 (9) ज्योतिप निमित्त - (भ) अ्यीतिय (1) पलित (11) सगरणना (111) मूत (1५) भ्स्न 24 606 466 ¢. सामुद्रिक व्य निमित्त विद्या 24 89 508 द, गए॒त मास्त (19) भ्रवर्ग्ित शेप - 6 4 कला, सामाजिक नान, जड वितान, चान कोशादि 1722 28 516 25 कुलश्रतिषा 2,350 परिशिष्ट - 1 प्रयकारा की नूच (्रकारादिद्रम स) 520

शुद्धिपनक

ग्रधि पुराना नदीं है इन भण्डार कौ स्यावनाका प्रिचेय कोई इतिहस म्प्य नहीदहै। श्री ( महावीरे म्वामी मन्दिरे भण्डार खरतर मच्यङेप्राचाय श्रो यशमूरिजी उनके चिप्य श्रीकेशरणणि द्रष्य विक्रम कट्वी कञतान्दः व्यवस्वि् रप सै मकलित कयि ग्येये) कवन श्री कुधुनायनी कै मदर वै मण्टारको छीढयर (जो करि पायव-द गच्यङे प्राचायश्री पाश्वच-दनी द्वारा स्यापिन विथाुभ्रा प्रतीच होवादहै) दाङ्गी कै मय

भण्डार जन्‌ पवेनम्बर लरतराच्छकी ग्राम्नाय वाता द्वारा स्यापिनव्र व्ययम्प्ित्तिहै प्रर इमी कारण प्राय करवै समी मण्डायाकंग्रय एक सरीवेहीदै।

यह्‌ सूची पत किम प्रकार वनाया गपा तत्सम्ब-घौ जानगारी स्पष्टोदरणा निम्नलिवित " सकरेत^में व्ििजारहरह दसमूचीपत्रकास्हील्प मखउपयोपहो नके उम वाम्नेउसर सेठ फो घ्यान पूवक पूरा षड लेना प्रतिवाद! उम प्रर भी यदि मुद्रित जानकार मूचना मे वसी प्रय के वारे प्राटम बृ्दको सतोपनदहा शका या विज्ञेय अिनासाहा तो प्रायना है नि हममे सम्पक्‌ कर परति घादि उपतन्प करानेमे श्रौर उह हर प्रकारसे सहयोगदनंम हम दमा ग्रहाभाग्य सममे

सकेत °

माट तौर पर यट मूचीपतर प्रचित केटनोगस केटनोगोरम ((9ग०्४५ @319०टूणप्)) पदति व, भारत सरकार द्वारा निघारित प्रपत्रानुमार बनाया गया दै प्रयो का विभामीकरण्‌ विषयसूची वे प्रनुसारदै। वह भी लगमग सरकारी विपय विभाजनस मत खातादहै। चूकि यह्‌ मूचौ पत्र जन तानि मण्डाराका है इमलिमे इममे जन प्रया कौ वहुतायत है यद्यपि सरकारी प्रपव्दैश्रनुमार समौप्रारयेजन प्रयो कव केवलएकही माग नम्बर सत््वेम डता ताता परतु मन प्रावश्यर मममरद्नजन प्रयो कां चार्‌ भागा (1 ते4) मवाटाहै निर पुन व्रमश 2-14-2 -34-2 कुत मितङ्गर 9 पिमा क्वि है ग्रौर परिनि भागे दुमरे विभाग के पराच दप विभाग त्रिय श्रत भाग 1 से 4 ममो विभाग उपविमाग मिनकर सरम्तर दारा निर्धारित मिवे भागक ही श्रतगनप्रातहै। माग 5 जनत्तर घाभिक प्रयो काह जिमम खरकार द्वारा निर्धारिति भाग

से 10 (कंवरन उपरोक्त माग 7 द्ोढकर) इन 9 मागा प्रयो का समावेश ग्रीर उह व्रम्त (प्र,से (ग्रो) तक विमाजितक्रदिणाटै। इमी प्रकार इत सूकरो प्रवे भाग6,7 8 श्रौर9रमेक्मग सरङारो निर्धारित भाग 11, 12 तते 16 23 24 के ग्रथाकोप्मतग प्रलग दिवा दियादै। श्रौरचूकि भाग 17 से 22व 25

तष के ग्रयदवित्कुल थोडे है श्रत उट्‌ दस मूचीपव्रके प्रतिम माग 10 मप्रवभीहित तेप छ्य दिमा दिया गवां है

जनग्रयो वे भाग विभाग उपव्रिभाग के पीपकोवो दमने चे सारा विमाजन लगभग भ्वष्ट हो जागा 1 हेम प्रायमो की सस्या वरै विवाद नदी डना चाहते हैश्मौरजो कामी प्रय क्सि मी सम्प्रदाय द्वार

न। है वह मेते कि वि शिम मान जतत दै वह हमनश्रामममेले तिया) दू साप्रदापिक खण्डन मण्डने विक्तेपकर धाकर्‌ रिया क्षण्ठसे मम्बध रघतहम्रत इसे उक्त मागका ही एक विमाग बना दियाहै।

तथा श्रमुक प्रय विसर विमाग दाला जाना चाहिये दस वारे मं कड वार एकः से प्रधि मत समव होते

ग्रथका चिवि ठि नि हीग्रयम विविध प्रत्र की विषय वत्तु होती दै ग्रत एर्‌ दम निविवाद शुद्ध विभाजनं प्रसभव है शौर जो चिमाजन किया गया है उमड़े सिः

ये एकान्त स्पे हमारा पराग्रह्‌ भौ नदी र।

सूचीपत्र के स्तम्भो मे दी गई सूचना को मुख्यतः दो भागों मे वांट सक्ते है--कुद् स्तम्भो की वीगत तो उस ग्रन्थ से सम्बन्ध रखतीहै श्रौर कुद स्तम्भो की वीगत उस भ्रति विशेषसे ही सम्बन्धित है। श्रव हम प्रत्येक स्तम्भ का थोडा विष्लेषण करना उपयुक्त समभते दै--

स्तम्भ 1-क्रमाक :--

इसमे हमने व्रिभागीय, या जहाँ है वहाँ उपविभागीय क्रमाक दियादहै। सामान्य श्रनुक्रमांक सारे ग्रंथ तक एक ही चालू रखा जा सकता था परन्तु हमारी गाय मे विभागीय संख्या का महत्व अ्रधिक हैश्रौरमूद्रण श्रादि मे सुविधाजनफ भी दै वेमे विषय सूचीमे कुल प्रतियो कीसस्याकायोगम्माहीग्याहै। साधारणतया हर प्रति की श्रलग प्रविष्टि करफरे विभागीय क्रमाक्र दे दिया गयारहै। परन्तु करई ग्रथ की श्र्वचीन प्रतिर्यां जो श्रत्ति सामाच्यदहैग्रौर पाठ भेद श्रादि ष्टियो से महत्वहीन है उनकी प्रविष्टि एकसाथ करदी गर्दै लेकिन वहा भी जितनी प्रततिया है उत्तते क्रमांकदे व्यि दहै (देखिये पृष्ठ 170 सिदुर प्रकर सति प्रतिये एक सायमे क्रमांक 120; से 1208) इस तरह सूची पत्र को श्रनावष्यक स्यसे वडा नदी होने दिया है) इसके विपरीत जिस संयुक्त प्रति मे एक से श्रधिक उस्लेनीय ग्रन्थ है उन सभी ग्रन्थो की अलग श्रलग प्रविष्टियां विभागानुसार भ्रकारादिक्रम से वीगत्तवार यथा-स्थान करदीदहैश्नौरक्रमाकदेद्िरहँ। म्मौरनच्ूकिेसी प्रस्येक प्रविष्टि मेषो की सख्या पूरी, प्रतिकीही लिखीदहै, जो श्रमोत्पादकन हो जाए इसलिये पन्नो की सख्या पर * तारे का चिन्ह लगा दिया) तथा जर्हा श्रावष्यक समभा गया है वहं सयुक्त प्रति के प्रथम ग्रन्थ कौ प्रविष्टि देखने की सूचना करदी गर्ईहै।

दुसके श्रतिरिक्त करई प्रतिं विशेषतः स्तवन मच्रादि एक दो पन्नो के प्रति लघु ग्रन्थ होति तथा प्रत्येक भण्डारमे कर सारे पन्नं स्फुटश्रौरन्रुटक भी होतेह ग्रीर कईगुटके भी होते है जिनमे बहत सी दछोरी-मोटी छृत्तियो का सकलन होता है हमने इन सव लघु ग्रन्थो, स्फुट बरुटक पन्नो श्रौर गुटको की पूरी छानवीन करके जो मुख्य या संकलनीय रचनाये प्रतीत हुई उनकी तो अ्रलम श्रलग प्रविष्टां करदीरहै; तथा वाकी वचे हुए इन प्रमहत्वपूणं श्रनुल्लेखनीय लघु गन्थो पन्नो को मिलाकर एक ही क्रमोक पर विधागानुसार श्रमे भ्रविष्टि कर दी दै कदाचित्‌ विषय की श्रधिक्र गहुरार्ईमे जाने वाले के लिए इन लघृकृत्तियो स्फुट बुटक श्रपूणं पल्लो की उपयोगिता हो सकती है इसी प्रकार गुटकोकोभीक्रमाकदेकर श्रलग से भी प्रविष्टिकरदीदहै। इस तरह हमने भण्डार की समस्त प्रत्तियो पूणं या श्रपणं, गटको तथा स्फूट पन्नो च्रटकं या लघु ग्रन्थो श्रादि सवको सूची पत्रमेले लिया है--वाहिर कुछभी नदी दछोडादहै)

स्तम्भ -2- सोत परिचयाद्धु, :--

चरूकरि यहं सूचीपत्र केटेनोगस्र केटेलोगोरम पदति से वनाया गयादहै ग्रतः इस स्तेम्म कौ श्रावश्यकतां है ताकि ग्रंथ उपलब्धि ग्रासानीसेकौजा सके मडारो के सूचक अ्रक्षरों का स्पष्टीकरण सुग्म्य है--यया

ग्रो-! श्र 16 ग्रोसिया के भण्डार की इस नम्बर की प्रति

क््‌0- 47/3 न्= श्री कुथुनाथजी के मन्दिर के भण्डार की पोवी संतालीस प्रतिस्था तीन के०--2/4 ` -- श्री केशरियानाथजी के भण्डार कौ 2 नम्बरकीपेटी की चौथी प्रति को0 - 1 न्= कोलडी श्री पाशवनाथजी मन्दिरके भण्डार की एक नम्बर की प्रति म0~-1 श्र 1 ध्री महावीर स्वामी भदिरके भण्डार की इस नम्बर की प्रति

मु0--1 ग्र 46 = श्री मुनिसुव्रत स्वामी मदिरके भण्डारकी टस नम्बर की प्रति

से0--1 श्र 58 = सेवामन्दिर रावटी भण्डार कीदृ नम्बर की प्रति

स्तम्भ 3--ग्रन्वकानामः:- जन ्रागम भाग को दछयोडुकर प्रत्येक विभाग के गन्योंको श्रकारादिक्रमते निखा गवाह ज्रौर उमनिये रूचीपत्र मे उत्लेखिते चन्पो को पुनः परिशिष्टे श्रकारादिक्रमस्ने सजाने की विनेषश्रावव्यकता नही नमन ग्‌

जन श्राम्‌ ग्र्थो कतै जन मा यतानुसार भ्रगसूव भ्नीर श्रगवाह्य मूत्र {पाच उप विमागोम विभाजित) भाजो नियत है तदनुसार लिल्ला गया है प्रौर यह विपयभरुची से स्पष्ट हो जात्ताै।

सिन विमामोवरणं कौ तरह नामकरण मे भीः एकस्पता नदीं टो सवती क्याकि मिन्न-2 प्रर सथोजना चसे ग्रवनाम का प्रथम श्रक्षः भी मिनो जादाहै1 उदाहरण स्वस्पर मौरी पाण्य स्तोत्र" प्रोर्‌ वितामणि पाण्य स्ताय" का रमनं मश पाण्व (गोदी) स्तात्रश्रौर पण्य (धित्ामहि) स्तोत्र एमा नाम देकर दोना स्तात्रा को श्रन्‌ ' पा" के नीचे सकतित करना प्रमीष्ट सममः है1 वई वार एक्प्रय विद्रव जगत मप्कते अधिक नामासि प्रचनित्त होता है जते दर्शन स्ततो क] सम्यक्दव सत्तरी" भी कहते है श्रीरशिचार पटक्निशिका चतुिशतिदण्डकण वचौवीमदण्डय या वेदल "दण्डक" पे नापते भी प्रसिद्रङे। उपराक्त कछिनि्या उत्पत समस्याग्रा कं निराकरण हृतु पाठका से रीर प्ि्ेपतया भोवार्था पठा हमारा विविदन है कि श्रमिलपित ययकी प्रविष्टिकं वारेम निराप होन वे पहल सभ्रावनीय प्रिविघ विक्त्पो वे प्रनुमार मूचीषत्र वो श्रच्छीप्रकारसे दू तथा लेक परिशिष्ट वी मी मदद ते! दस्र ब्रास्त पूरो विधय मूषी कौ हद्यगभक्णे तथा प्रविष्टि के समी स्तम्भा का देना दस प्राक्कथन सेत" वो भी चयान्‌ पूवव पटना प्राक्पपक हि) सूखी पना में भिमागीकरण, विषय सूची प्रकारादिक्रमणिषा इल्यादि सुविधावे हतु परतु प्रमादवश् उति दीण्कि माव प्राधारया वाना वनाततेने तो विद्यमान होत हव भी प्रय हाय नहीं लगेगा।

स्तम्म3^ - इम ग्रय मेय नाम रोमननिपिमदे दिया दै वारि देदनएमरी पिन जानेन वालोको दुदु युविषाहो

जाय तया उनक्र) महृलियत वे त्रिय ही मयौ पुदम सव्र भारतीय ध्रको फा प्रनर्रष्टरप स्पृह प्रयोणमे लिया गाहे)

स्तम्म 4-प्रयतरत्तादिकानाम --

दस्तम्भमग्रदयकार का नाम उसेत्र गुहयः पिता का नाम प्रौर उसकीश्राम्नायभीदेदी गहै ताकि पूरा नाम परिचय हौ जाव यदिग्रय दृति प्रादि सहित होनेसेदोग्रधवादोपे प्रधिक्र लेकोक्ीश््तिदहै तोन दाना या सदनप ताम पस्विय ह्षा मपा दै उनमद्रमानुमार्‌ प्रपम नाम मूल तेवक काहि प्रोरकरे भागे कत्तकारश्रादिकानाम लिता गया है जहां लवत्र वा नाम प्रतिम नहीं है षहांस्तम्मकोपातीहीरवा है सेदिन जहा पका निष्चयहो ग्या कि लेवक वा नाम मिवने बरला नहीं है वहाँ ८प्रनात' शब्दे त्तिवद्षा

दै कहीं कदी सायम प्रय की रवनाङ्े वप का उतेव भो परिधा है यचि प्रच्या यह्‌ रहता पिः रथन" समम की जानकारी एके स्वन-नस्तम्मम दी जात्ती।

स्तम्भ 5~-स्वषूप -

इम स्तस्पम्‌ सूचना दो दृष्टिकोण से दो गह दै) श्रयमत यह्‌ वाया गयादैनिप्रवग्ययाप्थमा

चदथा नाटक यासारिकएी यातालिक्राया यतर श्रादि करि प्रकारकाहै तथा दूमरेमे यह वतायागयाहै कि भाष्य, कृत्ति भ्रवचुरि, ट्या ^ बालाविचोध, 0 का रः स्वपन विन्रत्तिश्ादि त्ति निस्मया जाति कार प्राय परे लपक दनि वाल उपरोक्त शव्न के प्रयम श्रक्षरवा लिल ष्टमा है जिषका तात्पप उस षएष्द शे

(^ परहिमदाक्िादासेश्रधिक्‌ स्वरूप साये तो वह उठे स्कतद व्यि लिलत हव मी कदी कही यह्‌ उत्ते -- प्रवचन तति” मृ (लोग (ग) ह्‌ उत्लेव कर दिया है उदाहरण --' प्रवचन सारोदढार सद्दृत्ति

7 इत्ति सदित जा ग्यम है।

सखाय पार्क दी सि हि रि निन प्रकार है चथा लिय प्रयो बे स्वस्य वा स्पष्टीकरण दे देना उचितद्ोमाजौ

मू = मूल (476 1©>1) ग्रथति ग्रन्थ का मूल पाठ मात्रहै।

नि० = नियुं क्ति (11621101) |

जो निचित रूप से समग्रता प्रधिक्ताको लिये हुवे, सूत्रमे प्रभिहित, अ्रन्तनिहित सकेतित या स्थित है उन जीव प्रजीवश्रादि विषयो के प्र्थोको भली प्रकार परस्पर वाच्य वाचक सम्बन्ध पूर्वक प्रकट करनेके उवाय को (युक्ति योजना या घटना को) तिर्वुक्ति कहते है 1

यद्यपि सूत्रमे प्रथं ब्रीज रूपमे वतंमानरहैतो भी शिष्यो के सिए उप्तका रहस्योद्घाटन या विश्लेष करना द्िभाषण नही है, तथापि निर्युक्तिकार ्रधिकारक विद्वान है समी निर्णुक्तियां भराकृत भाषाको पद्य मय रचनाये है निक्षेप उपोद्‌वात सूत्रस्पशिकये तीन उसके प्रकारटै। निर्युक्ति निरुक्त से भिन्नहोती दहै श्रौर कर प्राचायं इसके दो भेद भी करते है--स्पर्णा निर्युक्ति निश्चयेन उक्ति।

भा० = भाष्य (17621156) मूल ग्रन्थ पर वह विशद रचनां जिसमे प्रायः भाष्यकार का स्वय का भी श्रथपुणं योगदान होता दहै भाष्य कटलात्ता है

यह्‌ प्रायः पद्य ली मे लिखा जाता श्रौर मूल ग्रन्थ की सपूरणां विषय वस्तु की विमिन्न चष्टियोसे समीक्षाभी की जाती है। |

च्‌ = चूणि (८९९85) मूल सूव्रकीजो गद्य ण्ैलीव सरलभापा मे विस्तार सहित प्रध्येता को हूदयंगम कराने के निये प्रभिव्यक्ति की जाती है उप्ते चरणी (या चरूएि) कहते है

चुणं घातु 'पेषण' के प्रथंमेहै ्र्थात्‌ सूत्रोका चूरा करके सूग्राह्यव मुषाच्य वना दिया जण्ताहै।

वृ० = वृत्ति (00510) दत्ति एक वहु उपयोगी महत्वपूरण विवेचन है जिसके माध्यम से शन्दाथं सह्‌ अ्ननुगामिनी व्याख्यादारा मून लेखक का संपुणं प्रभिप्राय निष्ठापूर्वक हेतु नय, शकरासमाघान श्रादि सम्मेत्त स्पष्टक्र दिया जातादै।

यद्यपि वृत्ति चूशि शब्दका प्रयोग एकद्रूनरेके लियि कर दिध जाता तो भी सामान्य पार्क के

लिये यह सूचना दै कि समस्त चूण साहित्य [श्रत्प सस्कृत मिधित) प्राकृत भापामेदही उपलन्धदै जवयकि मारी प्रचलित वृत्तियां सस्कृत मे है

ति

री० = दीपिका ([[[णाफो81) यथानाम दीपक कीत्तरह्‌ मूल प्रन्य पर लधु प्रकाश डालने त्रासी रचना को दीपिका कहने,

प्रायः करके वृत्ति को पश्चत्वर्ती होती है प्रौर भावानुव्राद द्वारा उसम रही हई जटिनत्ता का यह्‌ निरा- कर्ण चर सरलीकरण भी करती

प्र० = ब्रवचूरि (६प८त०१०ा१ $€ाऽ10फ) = (व मूल ग्रयक् उत (प्राय करके सम्टत) स्वातर यो ्रववूरि कठ जिम विना विन्तारबेभी

भावाय पून की तरद्‌ चिन जाना है 1 अव शब्द अनुमामीके व्रयमदै मादा चू दिया जत है।

वा०= वाचना (01560णाऽ€) शान्तरमिवातदटनु स्वाध्परायीकोषाठन्पम जो वक्तृना गुषढारादी जतै उति वावना कहै स्मरे भापाम वाण क्‌ सस्त जिमम व्या्था प्रता दाना सा सप्रविज हो जाता रै

व्या०=व्यास्प्रानि ({-ध्लपल) तदय वृलाई भर्‌ सगोष्टी उम विय पट्‌ नानदत द्ग से दिये गये भापरा को व्याव्यान कहतेह1

टि०= टिप्पणक (तवना) ग्रथकाम्ुनामाकरन तिय जो पद-रिप्पशिषा कौ जाती है उठ टिपएन वहने

चू0-= चूलिका (या चूडा (एलणाऽपऽ) मूत सर्वा चत या मूवित श्य की विकनेषप्ररूपणाके निष्‌ विशिष्ट सग्रह जा वहुधा प्रय गेधवमे जादा जातादहै चूलिका यात्तुहाक्हा जाता है प्हष्ड कवौ चोटी के सदश मानौग्रय प्र क्लशहो।

प० = पिका (९8151011) भूयम्नथ कं कतिपय श्मशा का मारयुक्तं विवेचन पिका कहलाता है 1 पजिक्रा = पदमभ्जिका।

टी0 = टीका ((णाादा8+)

श्रालोचना समाललाचना करते हूण पमी भी ग्रयमे तात्पय कौ बौगतवीर विस्तृतस्न्प षे प्रकट करने वाते प्रबधरकी टीकाकटतदहैं।

वा०= गालाविवाव्‌ (शलफदलणाक)

साहित्यिक भाषा लिष्वि गय मून प्रय का वहं मस्करण जो देशी बोनेचालकी मापामे व्यक्तया जाताहे बानाविवोषे (वालामिवोध बातावदाव वानवोध) कहनातारहै ताकि सामानय जन भौ उसका साभ

उट सक टे0 = टब्ब्राथ (01055)

पुरानी हस्तनिधित प्रतिया मे श्रल्रपरिकिनि शा या पदा के निवेचन या भावाय की वहुधा उस परनि मही मूतर स्वारतपे उपरसरत मापाम (यादेशोवोतीे) की गक सक्षिप्त लिलावट को रव्याय कहा नावा है एमे म्पष्टाकरणा को स्तवक नीक्हनट। स्वा0 = स्वोपनवृत्ति (0 (शाप) परपनप्रयको ग्र श्रधिङ् मुवा वनानि के लिये जव मू तेखक स्वय उष परः वत्ति (या भाष्य भादि) लवकर वि्नार करता है ता उघं स्वोपन ब्रत्ति (या माप्यादि) क्हतेरहै। = दुग पद पर्याप (या विषम्‌ पद वोच ब्रादि) (ल्यफप्याण्डक 20त6-८08)

भ्रवमभ्रायदहूवक्डिनियादृगम्य शन्न या पदावती का मरल साप मे लिवचन, परिमापा प्रषदा परथ पणन दुग षदपूर्यायक्हाजाताहै!

ग्रस्त० = ग्रन्तर्वाच्यि (11१८1९11) वाचनामे पूरकलरूपसे वाद्य वस्तुकासमवेश कर परि्रद्धन करना ब्रन्तर्वच्छिदै 'श्रक्षिन्त'' तो मून पाठकाभागही वना दिपा जाता है -्नन्तर्वाच्य उससे भिन्नदहै।

ग्रनु० = श्रनुवाद (ग7धाऽद्प्गा)

ग्रन्थ कीमूलभापाकोन जानने वातो के लिए भापान्तर द्वारा ग्रन्थ के शुद्ध स्वरूभका उनकी भाषामे प्रस्तुतिकरण प्रनुवाद कहनाता हे

व्याख्या = (18181101)

मूल कति के ममं को श्रासानौसे समभा देने वाली ग्रन्थ पदति की सामान्य संजाग्यख्या है शास्त्रीय टष्टिसे इसके 6 ग्रग होते दै---सहिता पदच्छेद, पदाथ, पदविग्रहु, चालना ग्रौर प्रत्याचस्था। चि0 = विवरण (7ि271211011)

विवरण शव्द सामान्य नकि विशेष पारिभापिक, श्रमे ही प्रचलित दै। प्रनवरत्ता वृत्ति के लिए इसका

प्रयो श्रधिक होता हि।

यद्यपि उपरोक्त परिभापायेदी गरईहैतोभीवे कोई कठोर निण्चयात्पक नही है एक मन्थ एकसे ग्रधिक परिभापाश्रो कै श्रन्त्॑त श्रा सक्तादहै ! प्रतः हमने भी ग्रन्थकारने अंसा श्रपने ग्रन्धको कहा है वेसाही सानं नलियादटै) स्तम्भ 6- विषय संकेत :--

यथ्चपिमोटेसूपमे विभागानुतार विषय सकेतहोजाताहैतो भी इस स्तम्भमे ग्रन्थ की विपय वस्तुक श्रति संक्षिप्ततम सारणश परिचयल्पमेदियादटै जो पाठको के लिए लाभप्रद मिद्ध होगा स्तम्भ ~ भाषा.-

ग्रन्थे प्राकृत, सस्छृत श्रपश्चण प्रादि जिस भाषामे लिखा गयादहैउस भापा को यातोप्रथम ग्रक्षरसे दर्णाया गयादहैग्रौरनहौतोभापाकापुरानाम लित दिया दहै)

एस प्रकार प्रा0 = प्राक्त डि0 = डिद्धिल रा0 = राजस्थानी स0 = सस्छृत हि = हिन्दी मा0० = मारुगुजर प्र0 =श्रपश्रण गु0 = गुजराती के बोधकर

जहां ग्रन्थ (मूल ~[-वृत्ति ्रादि) एकमे श्रधिकभापामे है वहु उन सभी मापाप्रो को वता दिया है) मिभ्रित्त होने से करई चारग्रन्यकौ भापाक्यादहे स्स वारे मे मतमेदभी हौ सक्ता जसे जयतिहश्रणख' स्तोत्र को कईलोग भ्राकृत कौ स्चना कहते है तो करट उमे श्रपञ्चश की 1 जिन ग्रन्थो कौीभषाको हमने 'मारगृर्जर' की संनादीहै उस वारेमे स्पष्टीकरण करना चाद्रेगे

परिचिमी राजस्वान गुजरात इस भू-भागकी मापा त्रिक्रम की चगभग 1 8िवी णतान्दी तक प्राव एवा सीदहीरहीदह्‌ श्रौर उसमे विपुन साहित्य रचा ग्यारह श्रपश्चश भ्पाके कालके वाद, प्रदेणकी ~स भाषाको क्या नाम दिया जविद्सवारेमे विद्वान एक मतनदहीषहै। चूकि विगत दो दई णताच्दियो मे राजस्थानी चं

गूवरतो निन मिय भापाप्नो कस्म उमरी दग्रत उत परावमं ा्र परलिगिक न्यामोढके कारणं 1 ञी से 1 हवो दन 5.6 शर्वान्पोमस्वेग्येग्रयाको मापाकोक्डनोप्रतो गुजराती या प्राचीन गराती कहर श्नौर क्टलोग राज-यानी क्ट्नह1 उदादर्ण स्यल्पं प्र्टमदावाद (गुजरात) ते चपर सूचौपत्रामे श्री तमम स॒द्ररनीक्ग्रनाकी नावादोस्व -आपमध्रमाकर मुनि पुष्यतिवयजी गुवरती वता है, जयकि जोवमुर (रानन्‌) सद्य सूवीप्ाम उदग्रयोकौ मापाम्व पदधरी मनि जिवविजवनी ने राचस्यानी वताई दै। स्स समथ भू-माय वित्र करन प्ति हान कं कारश जन सादुत दास रचित जन सादित्यमे तो यह माषा एतया साम्य -सना श्रविकदरै क्रि मापा नेद कौ कन्यना ही हाम्याम्पद लगती दै प्रयक्त्तानस्वय कीबोती चेरननाकी उम वोत तो पराई मना दक्र ग्न-वाव नहीं करना चिप श्रत इम मापा विवाद मे पड दमन सयम माग दग प्रनूमरण क्रनाही उपस्कर सममा है श्रौर कुददयमाना नामक प्रमिद्धग्रयमे मुम गय

मा- गुजर नाम्रम द्म भावा का वत्ताया टै तमन 19वी तान्न से धू की लगभग 5-6 शतािदर्मों की द्रत मू-मात कौ योतचात क्वा मादिप्यिक् भापाका समावेशहा गयार।

दम प्रकार उपराक्तं मात म्तम्भाम ग्रथ यौ जानकारी कं मक्ता का स्पष्टीक्राके वादश्रव उन स्नम्भाकाप्रिवदन त्या जहा है नो मल्यत प्रस्ठुनभ्रनिमे ही मम्बवितदै।

स्तम्भ $~ प्नो को सरया-

न्मस्तस्ममप्रतिकेकुतरपनादकी गुद्धमन्धरा जोट व्ह पिद गईं है जिसको द्विगुण्ित करन से पर्ष्टोकीमस्य्राश्जा उानीहैि। यगामत्रव कना को पिनेक्र मही मस्या लिली गर्ह म्रौर यीवमे गो पने क्महें श्रद्या ग्रिरिक्त उन ज्रमाका ती दिष्वसोदे दी गद्है श्वूरी याश्पूरा तवा क्हीक्टीं नुटव प्रतिकेभी परनाकप्रमाद्रः तो उपनव्वह ग्रयवा क्मरै वोगन्रार ति दिवं! तहाएकन श्रविः प्रति्यो कौ प्रविष्टि माकी वर्ह वह्‌ाप्र यर प्रतितं पनाङी म्या प्रजग-प्रलम तिवी गई है जिनका क्रम त्रिमागीष प्रमाकानुसार णमा समम तना चाहिय

स्तम्म 84 -नाप-

टस स्तम्भमप्रनिके वारमवचारप्रकारसंसूचनादो मदै पती सख्या प्रति को लम्यई ओर दुपरी मस्या प्रति कौ चोडाहदनातीरटै जोदानाने दी-~व्यम है तीस्ररी मस्या प्रतिपष्ठ (नकि प्रति पने म) क्रििनी पक्तियाटै यह्‌ यनाी ग्रौर चौ सख्या प्रति पक्त प्रौनतन क्रित श्रपरहँ यह्‌ दिषादीटै। चारी सस्यार््ोदोटगीक्रम मिवा प्रौर् उट प्रतय 2 क्टनत्तु सुधिया वे निय ववम ˆ६ निदान लगा दपा है। नहाप्नयवत्रत यन तालिका स्वल्यदही दै वहा लकीर ्रनयको सख्या नही दी है। तवा ज्हाप्रति प्नपराढी (प्रवात्‌ बीचमं पत्र ग्रय उनके वादय श्रार वत्ति प्रानि पिवरी हू) या टत्राव सदिति है वहा पक्तिपाव म्रक्ष -नीमन्यापूतकोहीदीदहै। नहा एक श्रधिङ प्रतिया की प्रविष्टिण्करसावमेकौ गई है वहा केवल भरतिदाकी सम्का्टर चोदार्दृषी दोटैग्रीरवे भी जवर प्रवि प्रति भिनहै वो लम्बाई चौडाः दोना की तधूततमव दीघनमरदा मन्प्ये लिघ्ठदीग्डहै) रटाठ नाग 3 (ग्रा) मक्तमरस्तोत 5 प्रनियो षौ प्रविष्टिदे सामने 24 27>12 13 निवन कात्य यद्‌ है ङि इव पाना प्रतिपा कौ चम्बा भित निन हिजोनीचेमे 24श्रौद ञ्चेम 7 रे-टीमीटरहै रौर दसौ प्रकार चौटाई्‌ भो भिन-2 टजीनीचेम 12 श्रौरङ्चे 13 से-दीमीटर है। द्रूकरिसटमीटर मी कोद बहून व्रिन्तार गाली दुग नींद श्रत हमने मीलीमीटराम जाना श्रौयस्कट्‌ बही सममाट- प्रायसे भवित को पूरा मटीमीटर गिन लिया ग्नौरश्नविसेक्मका स्मेड दिया दहै। स्तम्मं 9- परिमाण--

इस म्तम्मम भरी मूचना दो रष्टिकिराम दी ग्‌ 2 --

(11)

ग्रन्थ के स्कन्ध (खण्ड) पर्व, सगं, अध्याय, प्रकाश्र, परिच्छेद, ग्रधिकार, प्रकरण, उटशक, ढाल, पद, छन्द, गाथा, शयोक श्रादि की सस्या द्वारा उसका परिमाणा वताया गया है जहाँ उपलन्व है वहां प्रथाग्र [ग्रन्थके कुल श्रक्षरो की सख्या को 32 प्राचीन ्रनुष्टभ्‌ छद काश्रक्षर परिमाण) से भाग देने पर्‌ भ्रानि वाला भजनफल ग्रंथाग्र कहलाता है ] सख्या मी लि दी है परन्तु कभी-कभी यह्‌ ग्रंथाग्र संख्या वास्तविकतासे मेल नही भी खाती है क्योकि लिपिक इस सख्या को ्रनुमानसे प्रथवा वडा चढाकर श्रवा परपरागत पास्त्र वशित परन्तु वतंमान में प्रनुपलन्व है, वहु लिख देते दँ सूचीपच्रमे दी हुई पन्नो की सस्या को दुगना करनेसे पुष्टो द्धी स्ख्याभ्रा जाती है म्नौर उसे पक्ति प्रतिपृष्ठ की सख्या से गुणा करने परग्रथके कुत पक्तियो की सख्या न्ना जाती है रौर उसे श्रौ्तन क्षयो कीसख्या से गुणा करने पर ग्रन्थके कुल ग्रसे की सस्या श्रा जाती जिसमे 32 का भागदेनेसे प्रथाग्र की सख्या भ्रा जविगी-- दस प्रकार पाठक स्वय प्रंथाग्र ग्रनुमानित कर सकते हे

साधमे यह भी वताया गयाहैकिप्रत्तिसंपणंदहै या श्रपणं या बुटक प्रौर यदि श्रपुणंदहै तो कितनी प्रपुरता है यदि प्रति पूरे ग्रथके एक भ्रशहेतुही लिखी गईदहैश्रौर वहुश्रण पराह तो उसे प्रतिषरूणे' कहा गया है प्रथम या श्रन्तिम पच्च वहुषा नही होतेह तो प्रति को्रपूरं कहकर वसी टिप्पणी ति दी मर्ह कि पहला या श्रन्तिष प्चाकम दह उपरोक्त परिमाण सूचक शन्दोंके प्रथम श्रल्षर ही बहुधा सूचीषत्रमे लिते है श्रततः तदनुसार प्रथं लगा लेना चाहिये -जंसे = संपुणं, =घ्रपूणं, प्र =ग्रस्थाग्र।

स्तम्भ 10-~ प्रतिलेख वष, स्यल लिपिक :--

(1)

इस स्तम्भमे प्रतिके वारेमे तीन प्रकारसे सूचना दी गई टै--

सवं प्रथम प्रस्तुत प्रति जिस वपं निवी गई दहै वहु विक्रम सवत्‌ दिया गया) कदाचित्‌ कही परशकया वीर सवत्‌ य) प्रन्यसालहेतौ वला विशिष्ट उतल्लेव कर दिवा ग्या विक्रम सव्रत्‌ से णक सदत्‌ ईम्वी सन्‌ कमणः 135 प्रर 56 केम होता है जवकि बीर सम्बत्‌ 470 श्रधिक होताहै, परन्तु बहुत सी प्र्तिधो मे उनका प्रतिलेन सवत्‌ लिखा हुश्रा नही भिलतादहै। एेसी ब्रवस्थामे अरनुमानसे वह्‌ प्रति जिस ्तःन्दी मरे लिखी प्रतीत्त हुई बह पिक्रम की णताब्दी लिव दी गर्ह 1 स्यपि नमान लगाते हुए हमने पर्याप्त प्रनुदारद्ष्टिसे काम लिया (म्र्थात्‌ सदेहास्पद मामलोमे प्रतिं को प्राचीन की श्रपेक्षा ग्र्वाचीन ही ठतानेकीश्रोर भुकाव रहार) तोभीग्रन्दाजतो प्रन्दाजदही है श्रत. पाठकों को सलाह्‌है कि हमारे इस प्रन्दाज को टोस प्राधारन मनिले। सिन्न-मिन्न वर्पो मे लिखित प्रत्तियो की प्रविष्टि जवणएक साथहौकी गई दै वहां कालावयिकी सीमायेव यया योग्य सूचनादेदी गर्हे

(11) दूमरी सूचना प्रति किसस्थलमें लिघी गर्ह उसकी श्रौर

(111) तीसरी सूचना लिपिककेनामकीहं

स्तम्भे 11- विरेषन्नात्तव्य-

उपरोक्त सत्रके श्रलावरा ग्न्य ग्रथवाप्रतिकेवारेमेजो भी सूचना देता उपादेय या श्रावण्यक समभ

गयां उम ब्रास्ति उनन्तम्भकी शरण नी गहु यद्र तरहू-तग्ट की जानकारी से भदा गयाहुं रीर उनगा

ध्रपनोकन परिये विना प्रविष्टि पूरीदेव सीद रेषा नही कहा जा सकता दन स्तम्बमे द) गई जानकार)

1

कततिपय उदाट्र्ण है--दित्रित, शोधित, अ्रपठनीय, जीरं, प्रयम ब्रां, ताडपयीय या वस्त्र पर, देवनागरी से प्न निवि, स्वणक्षिर, ग्रन्व का दूस प्रचदित तस, प्ररित दै, वृत्ति प्रादिका नाप जो च्रवस्तर इृत्तिनःार श्रषनो य्लिकोौदेते ष्ट, नावम मीश वत्तु जोसनम्नदो श्रादि 21

0

उपरोक्त स्तम्भा प्रतिरिक्ति सग्कारी निर्धास्ति प्रपत्र द्वारा चार श्रय स्ठम्भो की श्रपेक्षा फी शरद्‌ टरै जो निम्न प्रकारहै --

(1) प्रति विस पर लिखो गरहहै -- कागज, ताढवव्र भोजपत्र, कपडा भ्रादि। (2) भरति परिस लिवि लिषी गई है -- देवनागरी मोड, धरसी, गुजराती (3) प्रि जौरा रीक दै या श्रदठनीय है इत्यादि सूचनः

(4) प्रय शद्यावधि मुद्रित हो चुप है प्रवा श्राज तक प्रमुद्रित हौ है।

परतु इस सूचीपत्र इन चार स्तम्भो कोनी रवा दहै श्रौर सका स्पष्टीकरण निम्न प्रकार

है -~-

लग्मग सारो को सार प्रतिया कागज प्र श्रौर देवनागरी लिपि (परक्षर प्रधिक्तर जन मोद वि हृण) लिखी हई है पतत श्रलग स्तम्भं यनाकर सवशर ,, का शिशान समने गृ सार नहो प्रतीव होता। दमो प्रकार इस सूचो पत्र उत्तखिन प्राय समौ प्रति्यो कौ प्रवस्या ठीक दै, पठनीय है श्रत उसका भी स्वत-त्र प्तम्म वनाना उपयुक्त नही लगा। हां, कदाचित यदि कोई प्रति कागज पर नहीं दै प्रथवा देवनागरी लिपि नही तिपी हई है प्रथवा जीण प्रठनीय दै तो चसा उत्लेव श्रवश्य " वि्चेप चातन्य' स्तम्म वर दिया गया है। विकतेप उत्ते वे प्रभाव मे पाठक निक यह सममः तें कि प्रति दवनागरी क्िपि मे कागज पर किवी हई है श्रीर उसकी दशा ठीक है। तथा प्रया के धरयवधि मुद्रित या प्रमृद्वित होति की जानकारी का सक्लनक्रनेमे हम धसमप रहै है1 भरत श्रपण र्वा श्रसत्य जानकारी देने की श्रपक्षामौन रहना ही धेयस्कर समभा दै) दसा पता शौधार्थी या प्रकाणक हमार) श्रेक्षा प्रामानी रला सक्ते

तथा इस वारं एक श्रीर निवेदन है। श्रतिरिक्त परिशिष्ट तया श्रौर क्ट स्तम्म सूचीपत्रं जोहे जा सक्ते श्रर उसे शौरघाथिया षौ श्रवप्य कुदधसुचिधाहौ जाती है पस्तु सायमेद्मे यह भौ नदी भ्ूलना चाहिय कि सूचौ-पत्र कौ ्रपनी मर्यादां होती है श्रौर सूवौ-एतर वनने वलि की योग्यता भी श्रसीमित नही रती। ग्य के वारे ्राव्रश्यक् सूचना स्म्मेत सूची बता देना पर्याप्त है, चाकी सव टर सारी सामग्री प्रचाक्रर णोधार्था का देने सं उस्म प्रमाद पनपतारटै भर-वेपण की जिनासा कुण्ठित हो जत्ती है जो ज्ञानके विकास के लिये घातक सिद्ध होतो है1 सूची-पय वितना भी विस्तृत हो, पोधार्थी कै लिवे तो श्रसल प्रति यारोटोित्म प्रिविम्ब देपने वै अवावा मत्यतर नदी दै, यह हमार निश्चय मत भ्रयया शोधकाय वै प्रति -याय नही होगा कैव्त सवौ चनानि वाति पद ही श्रधिक भार लादनं से यह्‌श्वम साध्य काय श्रोर इतना गुद्तर हो जावेशा कि हाधारण मनुष्य दसत षो हाथमे लेनै ते ही धरा जावणा - उसका उत्साह मारा जविगा। सूच पन सूचना है - जांच के लिये श्रामत्रण हि~ निणय का प्राधार तर्ही

॥॥

श्राभार परदशन

(1) 1. सुनि श्री जयानन्दजी महाराज साहिव को वन्दना कसते है जिनकी अराज्ञा से खरत्तरगच्छं समुदाय जोधपुर के श्रघ्यक्ष महोदय ने श्री महावीर स्वामी मन्दिर कै यशोसूरि केशरग्णि भण्डारो के ग्रन्थ य्ह रोवटी मे स्थानान्तररित करः व्यि है।

11 श्रीमान्‌ मिलापचम्दनी साहिव बटढा धन्यवाद के पात्र है जिन्होने श्री श्रोिणां तीथं कै रत्नप्रभ ज्ञान मंडारके सुचीकरण हेतु सम्पूणं सुविधा उपलब्ध की थी।

111. श्रीमान्‌ सम्पतराजजी साहिव ससाली धन्यवादके पात्र है जिनकौप्रेरणा से सुनिसुत्रत स्वामी मन्दिर भण्डार के ग्रन्थ यहं रावटी मे स्थानान्तरित कर दिये गेहं

1४. श्रीमान्‌ स्व. भोपालचन्दजी साहिवि दफ्तरी की श्रात्मा को शान्ति मिले जिन्होने श्री केशरीया- नाशजी के मन्दिर के भडार के सूचीकरण हतु सम्पूणं मुविधाये उपलन्धं की थी।

५, श्रीमान्‌ स्रायरमलजी साहिव पटवा धन्यवाद के पात्र है जिन्होने श्री ' चिन्तामणि पाण्वंनाथ मन्दिर कोलड़ी भंडार के सूचीकरण हेतु सम्पूणं सुविधार्ये उपलन्व की थी।

1. श्रीमान्‌ कलत्याएमलजी साहिव भंसाली धन्यवाद के पात्र है जिन्होने श्री कुधुनाथजी

के मन्दिर के मंडार के सूचीकरण हेतु सम्पणं सुविधा उपलब्ध कौ थी।

(९

(2) स्व. श्रगरचन्दजी नाहटा वीकानेर, श्रीमान्‌ मंवरलालजौ नाहटा बीकानेर एवं महामहोपाध्याय श्री विनयसागरजी जयपुर वालों को घन्यवाद दिया जाता है कि उन्होने इस सुची-पत्र की भूलो का परि- मार्जन संशोधन किया है

(3) सेवा मन्दिर के परिवारे से श्री वंशीधरजी पुरोहित वी.ए-एल.एल.वी., श्री सुशीलक्रुमार मथा एम.ए. एव श्री रामलालजी घाड़ीवाल के नाम विशेषरूपं से उत्लेखनीय हि जिन्होने इस सूची-पत्र को वनाने मे पूरा सहयोग दिया है।

तथा पुस्तक प्रकाशित करने का मुभे विल्कुल श्रनुभव नहीं था- यह्‌ प्रथम प्रयास है प्रतः कई भरते हुई ई। उदाहरण स्व्प प्रूफरीडिगि का काम मैते पूणंतः कर्मचारियो षर छोड देने की भयकरः भूल की श्रत्तः इस सूची-पत्र मे श्रनेक श्रशुद्धियां छप गर्द है) इने स्तव के लिये एक मात्र दायित्वव दोपमेरा ह्रीर्‌ तदर्थं क्षमाप्रार्थी हूं।

जोधपुर 2044, टोलि क्रा रजपर्वं

जौहरीमल पारख का प्रणाम दनक 3 भाच 1988

राजस्थान के जन ग्रंथ भंडासेष्षे हस्तलिखित ग्र॑थोंषा

सुची -पत्र

प्रथस खण्ड { जोघपुर नगर)

९०} 25६01210 41210 ©(21६ 81216215 ©^141.06६ {1210-\//11६८61॥) ४9105105

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जन ग्रगम-अंग सूत्र [ 3

------~~

नाप पंष्त्याक्षर : प्रतिलेखन ( वपय सफेत | नापा | पन्ते +त रः परिमाण स. श्रादधि | वि्चिष न्नातन्य 6 7 ` 8, 9 10 11 प्रथमश्रंग प्रा, 50 | 27 > { ¡ > 15 > 50 | स.दोनो स्क.्र.2644 | 14वी (श्राचर्ण) | १, 83 | 26 > 112८ 13240 | ¦ 1249 4 प्रा. मा, 80 | 25 > 11 >< 18 ८44 |स. प्र. स्कध [8 9 1{8 26 > { {>< {7 >. 58 19 18, 1833 ध] ६7 | 24 >< 11 >< 7; 33 भृ. विक्रमपुर | मनरग (५ ५; 150 | 24 > 11 >. 6८ 33 + द्- 9) 92 | 26 > {1 >< {5 > 58 19वी 1936 )? 63 | 26 >< 12 >. 5 > 36 -3-9 त्र, 18 दजरगगद्‌ लक्ष्पी 3 110 | 27>८ 12>.4> 32 1 +; +; »+ 4000 तवी प] 189 | 27 >< {2 5>५32. +, द्वि ,, ;, 85060| 20वी 43 27 >< 11 > 4 > 42 | श्र. छे रध्य, तक |५वी प्रा. 12 | 27 > 12 >. 13 >. 35 | श्रपूणं त्ुटक 12; प्रासं. | 58 | 25 > 12 >. 20 2५64 + 195; |लकीरो को मस्या भिन्न भिन्न प्रग साहित्य | सं, 398 26 >‹ {2 >: 13 >. 40 | सं. दोनों स्कधो की | 1847 ग्र. 12225 मा, 2 | 27 > 11>‹ 1] > 68 | सं ।9वी

द्ितीयघ्रंग | प्रामा. | 50 | 26211635 |सं. प्र. श्रध्य, 16 15174 ति १) 60 | 26 >< 11: 627 16वी # प्रा. 42 | 26 > {1 >: {5 >८54 [ ,, दोनो स्वध 223 श्रध्य| {653 २, 53 | 30 >+ {1 > 13 > 56 वी

4 1 भाग विपापं - 1 (धर) = 3 34 4 # | 23 | सूवश्ता्ूय उपायम उण शुमा गर (प) 21 | महा 1१४4 ¢ (न. 22 | मु सुगत 1946 १) ^ 23 | भर्व | , (वप) 24 | [१45 | ,, मा परू-ट

(ग) 25 | के नाप29/9| „, (१) 26 | भोति 118 ११ मूष 27 | केना 13/11 ५, नैदीपिका ॥१५..५ ) -हपपुणत| मू (0 28 | कु थु 29/2 2 ~ + नै + ~ प्ापुगम | + + 29 | महा [प्र३ वृत्ति »» {णोर |मू य्‌ 30 | के ना 18/40 + ~ + ११ | 31 (मूनिसु 3६214 (॥ गर्म स्वापो भू (प) 32 | केनाय 10/77| = ,, + (ग) 33 | ,, 15/132 वि गुषर्मा स्वामी ५» (प) 34 | कौली 872 # + (प) 35 | कं नाष 29/99. की वृत्ति १» शोतादाचाय ग्य 36 | मूनिषु 1 भ44 स्यानाद्गमूव् अवद ए२ ऽपा7ढ सुषमां स्वामो भू (ग) 3 | भि 1४19 , 38 | महा ¡प्र 9 वत्ति 9 षा गरधर्मा प्रमदेव तू षु (ग) 3ॐ9 (के नाय 4/3

1)

जैन श्रागम-क्रंग सूत्र

9११7

द्वितीय म्रंग प्रा. वा 9) 7 + | भ्रा. मा. भ्रा, 0 भरा.मा. + प्रा. सं 1) # 70 १) 1 +, महावीर स्तुति प्रा. + का] श्रध्या.| , +› वीर स्तुति। ,

1 प्रगाह्य | सं. नीसराग्रंण प्रा.

(ठःग्गाग) ४४ 3) ५४ प्राम

6

30 22 ४५ 54 63 30 51 50 89 346 12

132 105

8२ 241 131

84

27 >‹ 11 > {1 42 26 > 11 >< 13 >< 44 26 ‰‹ 11 >< {1 >< 41 26 >< 11 >‹ 11 >‹ 41 26 >< 1 ( > 6 > 32 26 >< {0 >< {1>. 33 26 >< 11 >< 15 > 35 26 >८ 11 > 17 + 45 26 >< 11 >< 18 >. 72 26 >< 12>‹ 15 >< 48 2९6 >‹ 11 >< 19 >. 59 25 > {0 > {4 > 44 26 >< 12 >< 19 >‹ 55 1 99:30 20 > 12 >< 16 > 34 २7८ 12 > 15 > 52 28 > 1 > 13 > 42 २6 >< 11 >< 15 > 46 32 >८ 13 >. 15 > 63 27 > 11 >< 12 > 39

ष. प्र. स्क. 10 27 # 9 % „+ द्धि. स्क. 4 अध्य „प्र. स्क ग्र 5000 प्र. स्क. कुं चटक

अ, 12 श्रध्य भ्र, स्क

श्र |उवेसे 23 प्रध्या सं.दोनो स्क.ग्र.16950 दि. म्रघ्य-मात्र

छठा प्रध्या. मात्र क्रियानाम प्रघ्य मात्र

छठा प्रध्या. मात्र

ध्र. उसे 23 प्रध्या. स. श्र. 3800 3459

„› 18000

,„, 3750

[की

37

1696/ 1761 धमदास {वी

| 8वी [छवी [तवी 20वी

1 वीं 178;

[वी

.| 1897

{न्रा 1867 16वी

[6वी

8 ] भाग विमा१ -] (न) 1 1 | 2 3 | 3५ | 60 | कावड 20 | मग्वतीपूव १2९२५०11 50178 भुधर्मास्वामी मृग) 61 | के नाय 5/3 1] ॥, [1] १, 62 | श्रोत्िया ¢ ॥ि 63 | महावोर [ष्‌ , वत्ति षप सुधर्मा ध्रमदेश [व (न) 64 | मनिस 140 7 ^ 1 1 1 65 | महावीराप्रा4 न. 66 | कोनने 1012| = „+, शृषर्मा स्वामी |मू(ग) 67 | महावीर [ग्र 7] ] 68 | बे नाथ 17/50| =, [वत्ति + नाप परमप नैव (प) 69 | कु मनाय 2/6 | = ,„, +-ट (ग) 70 | कालय {01 9 भू (ग ) 21 | कूयुनावऽ2।18 72 | रोति 2४408 ,, (ग) 73 | नाय 10/41 ^ | 74 | मूनिषु 1/प्र5| ,, 275 [दनाय 52/22 > नि 76 | नाय 6/10६ 1 मूग) 27 |, 6161 कीच्त्ति = णा पभयन्य गय 78 |, 9/1] छः ॐ» ॥\। ,। 19 | रौलो 21 का वाजतर + एमा

जन प्रागम-श्रंण सूत्र

पाचवा अग (व्याख्याग्रज््ति)

18, 37

भागम साहित्य (3,

वपय मूखी

| यर ति 8 | 8^ 9 | 10 | 41 प्रा. 401 | 27 >‹ 11 >< {3 >< 52 | सपण 1670 + 205 | 26 > 1{ > 17८ 54 | सं. भ्र. 15875 1698 7 904 26 > 12 > 13 >< 41 1887 रतल प,मनोरदांस प्रासं 971 | 24 > 13 > 15८47 , 4] शत्तक 1894 713 | 33 > 19 >< 17 >< 45 1900 तष्वतराम 9) 681 31» {5 >. 14>64 ,, ग्र {8616 | 1965 जोधपूर प्रा. 423 | २7 >< [1 > 11240 | त्रुखक [वी वीचमे करट पत्तं कम 168 | 26 >< 12 >< 13 >< 38 | श्रपुरं शतक &/ एत