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जेन मित्र मंडल 2क्ट लं० ११७

आप्र स्वरूप अन्वयाथे भाषा टीका

टीकाकार +

पं० उग्रसेन! जक्क- ४.०... !..!..[5.

अंक कि++ महावीरप्रसाद शामलाल जन मालिक फमे महतवास्थ्रसद एसड संज

रब | हर वावडः था दीन हहला |

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(८! 9

प्रचन बार सलीए ८६४:

| है दीर निवा.: श्मलर >> 5, है पहप्रयाग

( १) दो शब्द

पं० उप्रसैनजी जैन )(.8,, .,.3. वकील रोहतक समाज के सुर्पाराचित तथा प्रसिद्ध विद्वान हैँ आपको धम समाज सेवा की अनपम लगन है आपकी “धम शिक्षाबली चारों भाग! नारी शिक्षादश!' पुस्तकोंके अतिरिक्त'पुरुषा् सिद्धयु पाय! ओर “रत्ल- करण्ड श्रावकाच!र” की बुहद हिन्दी टीकाय भी प्रकाशित हो चुकी हैं। धर्म शिक्षावली और पुरुषा्थ सिद्धयुपाय कई वर्षों से परिषद्‌ परीक्षा बोर के पाठ्य क्रम में निश्चित हैं और इसी से. इनकी उपयोगिता स््रय॑ सिद्ध है। “नारी शिक्षादशे! भी अपने ढंग की अपूब पुस्तक हू तथा ज्ञान सामग्री से परिषण दे आपको उक्त दानों हिन्दी टीकाओं को लाग बड़ प्रंम उत्साह पढ़ते हैं

यह 'आप्र खरूप' अत्यन्त उत्तम ग्रन्थ हैं तथा इसमे शआप्त (सच्चे देव) का विस्तृत बन किया गया हैं भगवान के बिशेष गणों उनके नामों की साथंकता पढ़न याग्य है पं० अप्रसेन जी ने अपनी इस विस्तृत टीका सें प्रत्यक बात का अल्ली भांति पष्ट कर दिया हैं तथा इस सवा सुन्दर परिपुर्ण बनान में फिसी तरह की कसर नहीं २खी है अब प्रत्यक व्यक्ति इस प्रन्थ के मम का भली भांति समझ सकता है। इसके लिये टीकाकार अत्यन्त धन्यवाद के पात्र हैं

गत बे जालाई मास म॑ मेन समाज के प्रसिद्ध पनाव्य सर सेठ हुकमचन्द जी तथा देहली जन समाज के पसिद्ध धर्मात्मा

६: +) श्रीमान ला० महाबोरप्रसाद जी ठकेदार अपनी मित्र मंडली सहित पृज्य बाचा भागीरथ जी वर्णी तथा ब्रह्मचारी शीवलप्रसाद जी की बीमारी के समय उनस मिलने के लिय रोहतक गये थे ओर वहां जैन धम भूषण ब्रह्मबारी शीततभ्रसाद जी इस ग्रन्थ की चर्चा तेथा हिन्दी टीका की प्रशंसा की थी श्रीमान्‌ ला० महावीर प्रसाद जी ठेकेदार साहिब सभापति जंन मित्र मंडल, देंहली ने उसी समय इस ग्रन्थ की अपनी ओर से छुपाने की स्वीकारता प्रदान की थी ओर उन्हीं के द्रव्य से यह ग्रन्थ प्रकाशित हो रहा है

आशा है कि समाज इस संथ का पढ़ कर पर लाभ उठावेंगी।

निवेदृ4,--

रु

उम्रगव्सिह् जन

धर गुरा। देह प्रधान मंत्री, वा० जुलाई, १६.४६ जने मद्र मंटल ।॥

कि. ५4३) |

2 भालिक फर्म-- मेसस महाबीरप्रसाद एएड सन्‍्ज चाबड़ी बाज़ार, देहली |

आप जैन मित्र मंडल के सभापति तथा देहली की प्रायः समस्त ही धामिक सामाजिक संस्थाओं के आदशिय स्तम्भ हैं |

आप हो के द्रव्य से यह पुस्तक धरम प्रचारार्थ प्रकाशित

हुई है।

:॥08॥॥4348008॥8॥॥64.083.0008800000080000&4:0844404::00॥॥44५4.00004

है; ७8॥804.344:444,.444.4.8,44.॥/680॥44 ५4.44, 88 /4॥04.44..( &4344॥॥4404.434. 44.॥080&434.4034444.480 ५0 ५४६.७0 ५04५ 4888 ५७॥8/.0&44 03५44 68304.

श्रीमार ला० महाबीरप्रसाद जेन ठेकेदार रईस,

( )

प्रस्तावना

प्रत्येक आत्मा को संसार में अपनी चरम सीमा की उन्नति करने का अधिकार हे, ओर इसी अधिकार प्राप्ति के लिये बह सदा प्रतिपक्ष शक्तियों से तमल संघपे करता रहता हे, जब इस अपनी पर्णता को पा लेता है तव संघप बंद हो जाता है। आत्मा मुक्त हा जाता हैं संसार के प्राचीन दशेनों ने मृक्तिकी वड़ी महिमा गाई है आत्मीक मुक्ति को ही वे यथाथ मुक्ति मानने रहे हें इसी लिये इस प्राय: सबने स्वीकार किया है

उन दशनों में सांख्य दर्शन में आत्मा स्वयं ज्ञान का पंज नहीं हे बद्धि उसका गण नहीं हे, वह तो प्रकृति का बिकार हे मुक्त अबस्था में पुरुष व॒द्धि से पृथक हो जाता है अतएव बंद्धि नामक विशेष गण के अभाव में परुप का बणनीय काई निश्चित स्वरूप नहीं समझ पड़ता

न्याय ओर वेशेषिक दशन भी आत्मा को र्त्रत: ज्ञान स्वरूप मान, “ज्ञान आत्मा से कतई भिन्न है दोनों का मिलाप समवाय संबंध से हो रहा हे” मानता है अद्वेत दशन में आत्मा का कोई स्थान नहीं है आत्मा ओर परमात्मा का भेद माया से हो रहा है, साया भी कोई यथाथ वस्तु नहीं हे ऐसा होते हुए भी उस अयथार्थ वस्तु माया के लिये जाने कितने काल से नाश का प्रयत्न हो रहा हे यदि माया अयथार्थ है तो उसके विनाश के लिये प्रयत्न कैसा। यदि यथार्थ है तो अद्गैत कैसा

( हे)

प्राय:कर ये दर्शन--आत्मा अपनी सत्ता खोकर परमात्मा में मिल जाता है मानते हैं जब अपनी सत्ता नहीं, अपना स्वरूप नहीं तो उसको प्राप्त द्वोना आप्त बनना तो दूर की बात है मीमांसकों के यहां कमकांड की प्रधागता है, वेद अपौरुसेय है आत्मा प्रयत्न करने पर भी <द विह्वित यज्ञादि करने पर भी स्वज्ञ नहीं हो सकता अत: प्रयय्न कुछ विशष कायकारी नहीं ठहरता पर जैन सिद्धान्त बतलाता है कि दोष और आवरण का ज्ञय आत्मा में क्रम से होकर पूर्ण क्षय अवश्य हो जाता है जिस में क्रम से क्षय होता है उसमें पूर्ण ज्ञय भी हो सकता है, जैसे सोने का मल का क्रम से नाश ही पूर्ण नाश हो जाता है और सोना बिल्कुल शुद्ध हो जाता है, इसी तरह आत्मा से कम मल का क्रम से नाश होता और ज्ञानादि गुण प्रगट होते देखा जाता हे, अतएव उसमें किसी काल में दोषादिकों का पुर्ण नाश और उनके दूर होने से ज्ञानादि गणों का पूर्ण विकाश हो सकता है दोषावरणयोः हानिः निश्शेसाति शायनात्‌ कचियथा स्वहेतुभ्यों वहिरन्तरमलक्षय। स्वामी समंतभद्र

आत्मा के उन दोषादिकों का नाश अपना पराया भेद विज्ञान हुये बिना नहीं हो सकता, क्योंकि जब श्रात्मा दोषों को पर ही नहीं सममेगा तो उनको दूर ही क्यों करेगा उस भेद ज्ञान की प्राप्ति का साधन अपने स्वरूप की पहिचान या सच्चे देव शा्र गृरु की प्रतीति है क्योंकि आत्मा यथार्थ में सब बराबर हं जो

( )

एक का स्वरूप है वैसा ही सब का है, पर वह सबक। अपना हे किसी की सत्ता का विनाश नहीं है | अंतर इतना ही हे कि हमारा स्वरूप अज्ञान आच्छादित है, जब अज्ञान हटता है सब यथार्थ स्वरूप प्रकाशमान होने लगता है अरहंत की आत्मा अज्ञान से कतई मुक्त है अतएव उसमें से स्वरूप के दशन किये जा सकते हैं जद्दां सच्चा स्वरूप हे वहीं पर ज्ञान हे, उसी ज्ञान'के द्वारा सच्चे समस्त पदाथ की स्थिति है अन्यथा वे/ल्लेय नहीं हो सकते जो श्लय नहीं वे हैं ही नहीं सूत्तमान्तरित हरार्थाः प्रत्यक्षा कस्यचिद्यथा अनुमेपत्वतो5ग्न्यादिरिति सर्वज्ञ संस्थितिः समन्तभद्र इसलिये अरहंत,ही निर्दाष हाने से पर ज्ञानो हैं ओर इसी लिये उनके बचन प्रमाणीक हैं प्रमाण बाधित नहीं हैं

सत्वमेवासी निर्दोषो युक्ति शाख्राविरोधिवाकू | झविरोधो यदिष्टं ते प्रसिद्धन वाध्यते | समंतभद्र इस तरह आप्र के स्वरूप जब हमें यथाथ निणय द्वो जावे तो हम उसके बचनों पर बे रोक टाक विश्वास कर सकते हैं संसार में भी किसी बात की प्रमाणीकता वक्ता द्वारा द्वी की,जाती है वक्ता जितने अंशां में सदोष ओर अल्पन्ल हंगा उतना ही अवि- श्वसनीय होगा, जितना निर्दोष और विशेषज्ञ होगा उतना*ही प्रमाणीक विश्वसनीय होगा अरहंत भगवान घातिया कर्म. रहित होने से पूर्णे। निर्दोष

( )

पण ज्ञाता हैं अतएवं वह हमारे सत्यथ प्रदशेक या (परम हितोपदेशी हो सकते हैं ओर उनका आदर्श पा कर ही हम अपनी आत्मा का स्वतंत्र रूप से पूर्ण विकाश कर सकते हैं

संसार में प्रत्येक प्राणी अपना मांग निश्चिः नहीं कर सकता उसे तो बिरले ही करते हैं, हां साधारण जनता उसका अज़ुसरण कर अपना कल्याण अवश्य कर सकती ह, वियाबान बन को मदा- न्मत्त हाथीः ही भेदता है पर मांग बन जोने पर छुद्र जीव भी जाना शुरू कर देते हैं। साधारण जनता ता अपना आदश ढंढ॒ती है आदश -निश्चित हाने पर ही वक्ता के बचनों की प्रमाणीकता हुआ करती है, संसार में प्रत्यक सम्प्रदाय के अनुसार अनेकों महात्मा हुये हैं पर समुच संसार उन्हें आदश रूप से नहीं अप- नाया है क्योंकि आदर्श या आप्त की परिभापा ही सबकी कई एक निश्चित नहीं है-किर्सी भी सुमाम का प्रतिपादन करन के पृ आप ओर उसकी ठीक जानकारी के प्रमाणां का निश्चि करना सव प्रथम कत्तेव्य ठहरता है जिससे कहीं थीच मे ही हमे डिगना पड़े, हम पथ सूष्ट ही। जांच हमें अपना नेता भाग पर चलने के पथ साच समझ कर चुन लेना चाहिय जिससे ।नविष्न यर्थेष् पद्‌ पर पहुंच सके हमें आप्त आदृश। या सच्चे नायक दी परम करन का इन बातां का ध्यान रखना चाहिय:--

क््या वह यथाथ है ) उसमें पार करने की शाक्त हे अर्थान ठीक मार का हमें बता सकता हे ? वह अपन समान क्‍या हमें तना सकता है. ? उसमें कोई स्वाथाद दाप ता नहीं हैं ?क्या उसने

( )

स्वयं माग का अनुभव किया है ? क्या उसके द्वारा उद्िष्ट मांग अमल में लाया जा सकता है, कारा शब्दों का आडम्बर ता नहीं ? उसके द्वारा बताया माग स्वप्न जाल तो नहीं सदा शास्त्रत सुख शांति रूप है। इन्हीं दृष्टियों को लक््य रख आचायबर्य ने इस आप्त स्वरूप का निर्माण किया है जिससे जीव ये अनुभव कर सके कि आत्मा का अपना असली निज रूप क्‍या है किन परिवतेनों से वह प्राप्त हुआ है उन समस्त परिवतेनों का पुंज आत्मा का स्वरूप शास्रत भी है या नहीं ? इस समृच व्याख्यान का द्रव्य हृष्टि, पर्याय हृष्टि, निश्चय नय, व्यवहार नय, भूत नय, अविनय आदि अनेक प्रकार आचाय श्री ने बताने की कोशिश की है

आयाये श्री कब किस काल, देश, गण, गरुछ, संप्रदाय का सुशोमित किया है यह अभी नक प्रगट नहीं हो सका है, भाषा भाव शेली आदि अवश्य सध्य युग १६ वीं सदी तक के ज्ञात होते हैं इसका निगाय विद्वत्ममाज करगी।

श्रीमान पं७ जुगलकिशार जी सरसावा के सोज़न्य से उक्त प्र्थ माणिकचन्द ग्रन्थमाला को प्राप्र हुआ ओर उसकी ही असीम क्रपा से यह संस्कृत रूप से अकाश में आया | ऐस अनुपम ग्रन्थ को जा समृूच अपनी आत्मा के सार का बतान वाला है भाषा टीका ने हांता खटकन वाली वात थी, ह५ हू अनेक ग्रन्थों के अनुवादक जिनवाणी संबक त्रह्मचारी शीतलप्रसाद जी की प्रेरणा से पं० उप्रसन जी 3|.४.।.,.।.,]) परकील्ष द्वारा यह ग्ंथ भाषा- नबाद ओर भावानुवाद प्रकाशित हो रहा हू बाबु जी को सदा

( ८)

धर्म से प्रम रद्दा है आपकी कृतियों से पूरी धर्मक्षता टपकती है इसके पत्र आप नियमसार इंग्लिश, भावपाहुड़ इंग्लिश, पुरुषार्थ सिद्धयपाय, हिन्दी धरम शिक्षावली चारों भाग, नारी! शिक्षादश, रत्नकरंड श्रावकाचार का आधुनिक भाव भाषा शैली पर रोचक व्याख्यानादिक कर चके हैं

यद्यपि आपको अपने गृहस्थ कार्यों से बहुत क्रम अ्रवकाश मिला है तथा आपका स्वाश्य भी ठीक नहीं रहा हे फिर भी आपके हृदय में जिनवाणी की सच्ची लगन थी उस ही की घुन में आपने इसे परा करके ही छोड़ा है | हमें आप से आगे भी बहुत आशा है। हमारी भावना है कि आप नीरोग और चिराय ' हों जिससे हमें आगे भी अंगेजी हिन्दी उदूं में अन॒दित या मोलिक रचनाय प्राप्त हो सके ओर जिनवाणी का विश्व में प्रकाश कर सके

रवीन्द्रनाथ जेन रोहतक न्यायतीर्थ १०-५-४ हिन्दी प्रभाकर

( 40707 )

( ६) लेखक के दो शब्द

यह आप खरूप नामाका म्रन्थ श्री माणिकचन्द जैन प्रन्थमाला द्वारा प्रकाशित जैन सिद्धान्त सारादि संप्रह में छुप। हुवा है इस के समय ओर इसके कर्ता आचायवर का कुछ पता है हां यह जरूर है कि यह एक प्राचीन ग्रन्थ है इसके शोक श्री कुन्द आचाये कृत प्रवचन सार की संस्कृत टीका में उद्धृत अवश्य हें जिनसे पता चलता है कि यह एक प्राचीन ग्रन्थ है। इसमें श्राप्त के स्वरूप का दिग्दशन आचायेबर ने भिन्न श्रपेज्षा से बड़ी खूबी के साथ कराया हे यह प्रन्थ समाज के प्रसिद्ध विद्वान खोजक पं० जुगलकिशोर जी ने किसी भंडार में से खोज कर निकाला था, उनसे दयाफ्त करने पर भी इसके सम्बन्ध में कुछ विशेष विवरण प्राप्त नहीं हो सका

सन १६४० ई० के फरवरी मास में ब्र० शीतलप्रसाद जी रुग्णावश्था में इलाज के लिये राहतक पधारे थे, उनको ग्रन्थों का उद्धार करने कराने का शोक हमेशा हो रहा है, आपने मुझे आज्ञा की कि इस पंथ का अन्वयाथ तथा भाषा टीका अभी तक नहीं हुई है, इसे करदेव यद्यपि मेरा स्वास्थ्य भी उस समय ठीक नहीं था, तथापि ब्रह्मचारी जी की श्राज्ञा उल्लंघन के दोषारोपण के भ्रय से मैंने इस कार्य को प्रारंभ कर दिया बअह्यवारी जी की निगरानी में ही यह कार्य सम्पादन हुआ है, यद्यपि डाक्टर ओर वैद्य महो- द्य की यह कड़ी हिदायत थी कि ब्रह्मचारी जी कोई दिमागी कार्य कर परन्तु उनका धम्म प्रेम तथा जिन वाणी भक्ति उनको निचल्ा नहीं बैठने देती थी, अन्य कार्यों के श्रतिरिक्त इस प्रंथ के सुनने तथा ग़लतियों के संशोधन के लिये घंटे डेढ घंटे का समय आप नित्य प्रति निकाज्ञ दी लिया करते थे। जोलाई मास में यह टीका

( १० ) समाप्त हो गई थी दव योग से श्रीमन्‍्त सर सेठ हुकमचन्द जो साहिब इन्दौर, अपनी देहली की मित्र मंडली सहित जिस में चोधरी जर्गीमल जी जोहरि देहली, ला० महावीरप्रसाद जी रईस ठेकेदार, ला० रतनलाल जी रईस मादीपरिया मिस्टर अजित प्रसाद जी आदि कई माननीय महोदय सम्मिलित थे, रोहतक ब्रहाचारी जी से मिलने के लिय पधारे, ब्रह्मचारी जी ने श्री सेठ हुकमचन्द जी से इस ग्रन्थ को मुद्रित कराने के लिये कहा उस पर ला० भहावीरप्रसाद जी ने अपनी लागत से इस ग्रंथ को प्रकाशित कराने की स्वीकारता दी अब यह उन्हीं की ओर से प्रकाशित होकर पाठक महादयों के हाथों में पहुंच रहा है। इसके लिये हम ला० महावीरअ्रसाद जो के प्रति अपनी

कृतज्ञता प्रगट करते हैं |

इस ग्रन्थ के लिखने तथा प्रफ संशोधन में मुझे पं० रवीन्द्रनाथ “न्यायतीथ” हिन्दी प्रभाकर तथा मेरी अपनी पुत्री कुमारी विद्या बति जन “हिन्दी प्रभाकर” से बड़ी सहायता मिली इसके लिये उनका आभारी हूं। भाई रघ॒वीरसिह जी कोपाध्यक्ष जेन मिन्र मंडल देहली ने गयादत्त प्रेस द्वारा छुपवान मे जा कष्ट उठाया है उसके लिये हम उनके ज्ञ हैं

इस ग्रंथ की इस टीका को प्रकाश में लाने का अधिकांश श्रेय ब्रक्षचारी शीतलप्रसाद जी को द्वी है, इसके लिये जैन समाज उनकी चिरकाल तक ऋणी रहेगी

हमें आशा है कि पाठक गण इस ग्रंथ को पढ़ कर परा लाभ उठाबंगे।

ज्येष्ठ शुक्ला पृ ेणासी उग्रसेन जैन (गोहाना निवासी)

रोहतक १०-४-४१ 9, ०४.....8

ओश्म्‌ नमः सिद्धेभ्यः आप्त स्वरूप ग्रन्थ की भाषा टीका

दोहा--मंगल श्री अरहन्त सिद्ध, आचारज उबसाय | साधु पंच परमेष्टीपद, नम नमूं गुण ध्याय

'छोक-आप्ागमः प्रमाएं स्याधथावद्धस्तु सचकः यस्तु दंषिविनिमुक्तः सोधयमापो निरज्ञन॥१॥ अन्वयाथथ--(यथावत्‌ वस्तु खचकः) यथार्थ वस्तु की ग्रगट करने वाला (आप्त आगमः) आप्त द्वारा कहा हुआ आगम (प्रमाण स्थात) मानने योग्य होता है (तु) और (यः) जो (दोषेः) दोषों से (विनिमनुक्तः) रहित है (स) वह (अयम्‌) ही (निरज्ञनः) मल रहित वीतरागी (आप्तः) आप्त वक्ता होता है भावाथः--सच्चा मानने योग्य आगम वही है जिस में वस्तु का सत्यार्थ स्वरूप; वीतरागी, सर्वेज्ञ, हितोपदंशी चार घातिया कम रूपी मल रहित, अनन्त चतुष्टय संयुक्त श्री अरहन्त परमेष्टी द्वारा प्रतिपादन किया गया हो सच्चे आप्त द्वारा कहा हवा आगम ही अन्य जीवों का कल्याण कर्ता होता है, उसमें तत्व भत जीव के हित का उपदेश पाया जाता है, पवोपर विरोध से रहित होता

३)

है किसी भी वादी प्रतिवादी द्वारा खण्डन नहीं किया जा सकता, मिथ्या मागे का निराकरण करके ग्राणीमात्र के कल्याण रूप मार्ग का प्रदशक होता है। सच्चे आगम में समस्त जीवों को दया पालन करने का तथा रागादिक विषय कषायों का अभाव कर परम स्वाधीन आत्मानन्द को ग्राप्त करने का उपदेश प्लुख्यतया होता है। ऐसा उपदेश ऐसा ही वक्ता कर सकता है, जो सर्वथा निर्दोष हो, वीतरागी हो, जगत के समस्त त्रिकालवर्ति पदार्थों को उनके समस्त गुण पर्यायों सहित यथार्थ जेसा का तेंसा जानने वाला ही भगवान अरहन्त ही ऐसे आप्त हैं जिन के द्वारा ऐसे उपदेश की प्राप्ति भव्य जीवों को हुआ करती है। भव्य जीवों के पुण्य निमित्त से ही अरहन्त परमेष्टी का विहार अनेक देशों में होता है जहां उनकी दिव्य ध्वनि द्वारा धर्म रूपी अमृत की वर्षा होती है प्रभु की दिव्य ध्वनि की ऐसी अचिन्त्य महिमा है कि जब वह ध्वनि होती है तो उसमें पदार्थों के स्वरूप का ऐसा प्रकाश होता हैं कि जिसे सुन कर अनेक जीव देव, मनष्य, पशु सब ही अपनी भाषा में उसका मतलब समभ लेते हैं पदार्थों का सत्यार्थ स्वरुप प्राप्त कर अपने अज्ञान और मोह को मिटाते हैं | धर्मामत का पान कर अनादि से लगी विषय कृपाय को तृपा को शान्त करते

( ३)

हैं। अल्प ज्ञानियों के ज्ञान में यह बात नहीं पाई जाती, भगवान का ज्ञान केवल ज्ञान होता है, जो समस्त ज्ञेय पदार्थों को एक समय मात्र में एक साथ ही जानता है, जो सदेव ही श्रकाशमान रहता है जो अनन्त तेज का भरा हुवा है, ऐसा ही ज्ञान वास्तव में वस्तु के यथार्थ स्वरूप को जान सकता है।

रागी, देषी, विषयी कपायी, मिथ्या दृष्टि एकान्त वादी अल्पन्ञों द्वारा श्रतिपादित मागे कभी भी कल्याण मार्ग होनहीं सकता

आप्त का आगम अनेकान्त वाद रुप है, क्योंकि वह अनेकान्त रूप वस्तु के स्वरूप को बताने वाला है, हर एक वस्तु अनेकान्त रूप अर्थात्‌ अनेक स्वभावरूप है, वस्तु द्रव्य की अपेक्षा नित्य है पर्यायों की अपेक्षा अनित्य है, अभेद की अपेक्षा एक रूप है, अनेक गुणों की अपेक्षा अनेक रूप है। अपने द्रव्य क्षेत्र काल भाव की अपेक्षा अस्ति रूप है, पर द्॒व्यों के द्रव्य क्षेत्र काल भाव को अपेक्ता नास्ति रूप है इत्यादि इसी बात को जिनागम ने स्पाद्ाद नय के द्वारा समझाया है।

(स्यात--किसी अपेक्षा से; वाद कहना)

जेंसे स्वर्ण द्रव्य को लीजिये, अपने गुणों की अपेक्षा यह नित्य परन्तु पय्यांयों की अपेन्षा अनित्य है। सोने

( 9)

की डली से कुण्डल बनाये, सोने के वास्तविक गुण डली की हालत में तथा कुण्डल की हालत में एक ही हैं उनमें कोई अन्तर नहीं हुआ, परन्तु डली का आकार बदल कर कुणएडल रूप होगया इस आकार के बदलने की अपेक्षा सोना अनित्य है | सोने में नित्य अनित्य दोनों ही स्वभाव हर समय विरोध रहित पाये जाते हैं। इन दोनों नित्य अनित्य स्वभावों की समभझाने का तरीका स्याद्दाद है क्‍योंकि दोनों स्वभावों को बचनों द्वारा एक साथ नहीं कह सकते, कहते समय यही कहेंगे “स्यात्‌ सुबर्ण नित्य है” अथांत्‌ किसी अपेक्षा यानी गुणों की अपेक्षा सुबर्ण नित्य है, फिर कहेंगे “स्यात्‌ सुबर्ण अनित्य है” अर्थात्‌ किसी अपेक्षा से यानी पर्याय की अपेत्ा सुवर्ण अनित्य है| इस दृष्टान्त से यह साफ़ हो जाता है कि अनेक स्वभावों के धारक “वस्तु” के समझाने का तरीका स्याद्वाद्‌ अर्थात्‌ अनेकान्त वाद है। इसी लिये पूज्यवर श्री अमृतचन्द्र आचाये ने अपने पुरुषार्थ सिद्धयु पाय नाम ग्रन्थ की आदि में अनेकान्त वाद को नमस्कार किया है --

परमागमस्य बीज॑ निषिद्धजात्यन्ध सिन्धरविधानम सकलनय विलसितानां विशेधभथन॑नप्म्यनेकांतम

( )

मैं परमागम के बीज अनेकांत को नमस्कार करता हूं, जिसने जन्म्रान्धों द्वारा जाने हुए हाथी के कल्पित विधान को दूर कर दिया है और भिन्न नयों अर्थात्‌ अपेक्षाओं के विरोध को मिटा दिया है। कुछ अन्धे एक हाथी को देखने के लिये गये, एक ने हाथी के कान को छू कर कद्दा हाथी छाज जैसा है, एक ने हाथी के संंड मात्र को छू कर ही निश्चित कर लिया कि हाथी मृसल जेसा है, एक तीसरे ने हाथी की टांग को छूकर समझ लिया कि हाथी थैभ सारिखा है, इस प्रकार जब तीनों ने अपने अनुभव का मिलान किया तो विरोध के कारण भगड़ने लगे एक देखने वाले ने जिसने हाथी के सवांग स्वरूप की देखा था उनको समझाया और कहा भाई विरोध करो भिन्न अंगों की अपेक्षा तुम्त में से प्रत्येक ठीक है परन्तु एक अंग मात्र को हाथी नहीं कहते, हाथी सवाग होता है अथांत्‌ इन समस्त अंगोंपांग के सशृदाय का याम्र हाथी है। ठीक इसी प्रकार जिनागम में वस्तु को अनकान्त रूप बताया है| ऐसे आगम का वक्‍ता ही सच्चा आप्त होता है, जिसका वर्णन इस ग्रन्थ के आगे के छोकों में किया गया हैं दोषा वरण मुक्कात्मा कृत वेत्ति यथास्थितग। सो5ह स्तत्वागर्म बकतु यो मुक्तो5 नत कारणे;॥

(६ )

अन्वयार्थ- (दोषा वरणसुक्तात्मा) रागादि दोष और ज्ञाना- वरणादि कर्मों से रहित आत्मा (यथा स्थितम्‌) यथार्थ स्वरूप में रहने वाले (कत्स्नं) समस्त पदार्थ समूह को (वेत्ति) जानता है (य) जो (5नत कारण) मिथ्या भाषण के कारणों से (प्रुक्तः) छूटा हुवा है (सः) वही (तत्वागर्म) तत्वों से परिप्ण आगम को (वक्त) कहने के लिये (अं) योग्य होता है | भावार्थ- वास्तव में यथार्थ वक्ता सबेज्ञ बीतरागी दी होता है। क्योंकि रागी द्वेषी वक्ता का उपदेश अपना तथा दूसरे का राग ह्वेष पृष्ट करने के निमित्त ही होता है | रागी द्ेषी के स्वाधीनपना नहीं होता। वह सर्देव आकुलित और भयवान रहता है। जो काम, क्रोध, संग्राम आदि अहिंसा प्रधान क्रिया को करके ओर पर के अहित की ग्रवति करते कराते हैं उनके सत्याथ वक्ता पना नहीं होता जिनके इन्द्रिय विषय भोगादिक की लालसा बनी रहती है, जो निरन्तर कनक कामिनी में आसक्त रहते हैं, जिनके पंसारी बन्धनों के कारण अनेक प्रकार की आकुलतायें नी रहती हैं, जो अल्पन्न हैं, जिनका ज्ञान इन्द्रिय आधीन जिनकी आत्मा के ऊपर मिथ्यात्‌ ओर अन्नान का निविड़ हा तम (घोर अन्धकार) छाया रहता है, वह सत्याथ 'क्ता कैसे हो सकता है। राग ढेप का धारक अ्रभिमानी,

( )

विषय लंपटी तथा अपनी पजा खरुयाति चाहने वाला केसे सत्याथ वक्ता हो सकता है रागी ढेषी कभी सत्य पदार्थ का निरूपण नहीं कर सकता। भय से, लोभ से, या आशा से वह अथ का अनर्थ कर देता है। वस्तु के विपरीत भाव का प्रतिपादन कर जगत के भोले भाले जीवों को ठगता है| आप ठगा जाता है यह बात भी निर्विवाद सिद्ध है कि जिस आमम में पत्तपात पाया जावे, जिसका वादो प्रतिवादी द्वारा खंडन किया जा सके, जो यक्ति ओर प्रमाण की कसोटो पर ठहर सके जो वस्त के निज स्वरूप तथा परभाव का निर्णय नहीं कर सके, जो हेय उपादेय, कृत्य अक्वृत्य, देव कुदेव, गरु कुगरु, धर्म अधमं, हित अहित, मक्ष्य अभक्ष्य का निर्णय कर वस्त के यथार्थ स्वरूप की नहीं वता सके, जो केवल शब्दों का हेर फेर कर लोक रंजन, असत्य कुकथा तथा संसार में भ्रमण कराने वाली अनेक विकथाओं की रचना करता है, जो संसार से उद्धार करने का यथाथ उपाय बताने में असम हैं उसका कहा हुआ उपदेश आगम नहीं हो सकता वह तो कंबल शब्दों का आउम्बर है वरत के यथार्थ स्वरूप का प्ररूपण उस में नहीं हे

आज संसार में जो अनेक मिथ्या मतमतांतर प्रचलित दो रहे है ओर अनेक भ्रशाचार को प्रवत्ति हो रह्दी है

( )

वह सब भेष धारी, कुलिंगो व्यक्तियों दरा रचित अनेक कल्पित शास्रों के आधार पर ही हो रही है। परीक्षा प्रधानी को उचित है कि परीक्षा पक आगम को ग्रहण करे गम सर्वज्ञ वीतरागी हितोपदेशी द्वारा कथित ही मानने योग्य होता है। ऐसे ही आंगम में जीव, अजीव, आखब ,बंध, संवर,निजेरा और मोक्ष इन सात प्रयोजनभत तत्वोंका स्वरूप पाया जाता है अपने शुद्ध स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने के लिये इन सातों तत्वों का जानना बड़ा ज़रूरी है, यह सातों तत्व सर्वज्ञ प्रणीत हैं| अल्पन्न पदार्थों की त्रिकाल वर्त्ती परिणति को युगपत जानने में असमर्थ होते हैं, वस्तु के यथाथे स्वरूप का वह निरूपण नहीं कर सकते इस लिये सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित तत्व ही प्रमाणीक हैं--तत्व सात ही होते हैं, कम ज्यादह नहीं | आत्मा का वास्तविक हित सुख शान्ति प्राप्त करना है, सुख शान्ति आत्मा का निज स्वभाव है आत्मा का स्वभाव द्रव्य अपेक्षा से शुद्ध है, परन्तु संसार अवस्था में अनादि काल से कम से बन्ध के कारण मेला चला रहा है, आत्मा का पर्णं हित इसमें है कि आत्मा ज्ञाना- वर्णादि अष्ट द्रव्य कम, राग द्वेप आदि भाव कर्म तथा शरीरादि नो कर्म रूपी मल से स्वंधा रहित हो, अपने अविनाशी शुद्ध चिदानंद रूप में स्थिर हो, पूर्ण स्वाधी-

)

नता को प्राप्त हो। आत्मा की इसी अवस्था का नाम मोक्त है | इस कर्म रहित शुद्ध आत्मा को ही परमात्मा कहते हैं जब आत्मा पूर्ण मुक्त अवस्था में होता है तो अपने निज स्वभाव में मगन होकर निजानन्द का ही भोग करता है। इस मुक्त अवस्था को ही परम ध्येय मान कर इन सात तत्वों का निरुपण किया गया है | इन तत्वों द्वारा यही तो बताया गया है कि वास्तव में स्वभावतः आत्मा शुद्ध है, कर्मों के संयोग से अशुद्ध है रहा है, इन कर्मों का आत्मा से कैसे संयोग होता है, ओर कैसे इन कमों का वियोग होता है, ओर सर्वेथा कर्म रहित होने पर ही यह संसारी आत्मा परमात्म पद को प्राप्त होता है एक चतुर न्यारिय के लिये यह जानना जरूरी है कि खोटा अशुद्ध सोने का क्या स्वरूप है, खोट क्या है, खोट केसे मिलता है, खोट के मिलने को केसे रोका जा सकता है मिले हुवे खोट को केस दूर करके सोने को बिलकुल शुद्ध बनाया जा सकता हैं ओर शुद्ध सोने का वास्तविक स्वरूप क्या है | ठीक इसी प्रकार एक सच्चे म्ुमक्ञ के लिये यह जानना जरूरी है कि आत्मा (जीव) क्‍या है अजीब (कर्म) क्या है? जीव की ओर कम क्‍यों और केसे आते हैं (आखब) आत्मा के साथ उनका संबन्ध कैसा है ओर क्‍यों हे! (बन्ध), आत्मा की ओर आते हुवे कर्मों को

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केसे रोका जा सकता है (संवर) बन्ये हुवे कर्मों को आत्मा से दूर केसे किया जा सकता है (निजैरा) स्वथा कर्म रहित होने पर शुद्धात्मा को क्‍या दशा होती है (मोक्ष)। इन ही सातों को जेनाचार्यो' ने सप्त तत्वों के नाम से कहा है इनका ज्ञान होना बहुत जरूरी है इनको जानने से ही हम अपने आत्मा को शुद्ध बनाने का उपाय कर सकते हैं

यह लोक जीव अजीब द्वव्यों का समुदाय है, जहां जीव अजीव द्रव्य दिखाई पड़ते हैं उसे लोक कहते हैं। यह बात भी अनुखव सिद्ध है कि सत्‌ का कभी विनाश नहीं होता और असत्‌ का उत्पाद नहीं होता। जगत में किसी द्रव्य की केवल पर्यायों या अवस्थाओं का नाश तथा जन्म होता रहता है परन्तु मृल द्रव्य सर्देव बना रहता है। सोने के जेवर, कड़े, कुन्डल, चेत आदि बनाये जावें या बिगाड़े जावें तो सोना बना ही रहेंगा। किसी द्रव्य को कोई भी अवस्था पहली अवस्था को ही बिगाड़ कर बनेगी | जिस समय एक अवस्था बिगड़ती है उसी समय दूसरी अवस्था बनती है। इस ग्रकर का परिणमन संसार के समस्त ही पदार्थों में होता रहता है जगत का सब व्यवद्वार इसी हेतु से चल रहा है द्रव्य की पर्यायों का ही परिणमन हुआ करता है मूल द्रव्य सदेव बना रहता है, मूल द्रव्य का कभी विनाश

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होता है ओर कभी उत्पाद होता है। इस से यह बात सिद्ध होती है कि जीव अजीव द्रव्य मूल में उपजते हैं, विनशते हैं; तब यह लोक जो इन जीव अजीब द्वव्यों का समुदाय है यह भी कभी उपजा है और कभी विनशेगा यह लोक अनादि अनन्त है अक्रृत्रिम है, कोई इसका कर्ता है हृतां है। यक्ति और प्रमाण से भी यह सिद्ध नहीं होता कि परमतन्रह्ष, परमेश्वर, परमात्मा स्वेदर्शी, परम ज्योति स्वरूप निर्विकार इश्वर इस जगत का कर्ता हर्ता है; यह जगत तो अनादि निधन है

यह जगत मूल द्रव्यों की अपेक्षा सत्‌ रूप है। नित्य है, अक्ृत्रिम है, अनादि अनन्त है, स्वतः सिद्ध है | इस अनादि जगत में तत्वों का उपदेश भी प्रवाह की अपेक्षा अनादि है, अनभिज्ञ भव्य जीवों को समझाने के लिये,धर्म मागे चलाने के लिये इन तत्वों के विशेष कथन की आवश्यकता है। इन तत्वों के कथन से और इनके वास्तविक स्वरूप को समभने से भव्य जीवों को यह निश्चय हो जाता है कि यह जीव संसार में दुःखी क्‍यों है, ओर इस दुःख से छुटकारा पाने का क्‍या उपाय है |

जीव तत्व--जो चेतना लक्षण सहित विराजमान हो उसे जीब तत्व कहते हैं जीव दो प्रकार के होते हैं संसारी ओर मुक्त। जो जोव कमे सहित हैं वे संसारी हैं, जो कर्मों

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से सर्वथा रहित हो गये हैं वे मुक्त जोव कहलाते हैं। कमों के उदय से ही जीव की अवस्था संसार में अशुद्ध तथा पर संयोग रूप हो रही हैं | कर्म आठ होते हैं ज्ञानावरणी, दर्शनावरणीय, मोहनीय, अन्तराय, आयु, नाम, गोत्र, और वेदनीय

ज्ञानावरण के उदय से ज्ञान छिपा रहता है, दर्शना- वरण के उदय से दशेन शक्ति दबी रहती है मोहनी कर्म के उदय से मिथ्या श्रद्धान क्रोधादि कपाय रूप जीव के भाव द्वोते हैं, अन्तराय कर्म के उदय से आत्म बल ग्रकट नहीं होता ये चारों कर्म घीतय कर्म कहलाते हैं क्योंकि यह जीव के गुणों को अशुद्ध कर देते हैं, बाकी चारों कम अधातीय कहलाते हैं, वे आत्मा के चारों गुणों का घात कर जीवों की बाहरी अवस्था का ही निर्माण करते हैं। आयु कर्म जीव को शरीर में रोके रखता है, नाम कम शरीर क्री शुभ या अशुभ रचना करता है। गोत्र कम जीव को लोक द्वारा पजित या लोक निन्ध कुल में जन्म कराता है वेंदनीय कर्म साताकारी तथा असाताकारी साम्रग्री का संबन्ध जुटाता हैं | जब तक इन कर्मो' का संबन्ध आत्मा के साथ बना रहता हैं, यह संसारी जीव स्वाधीन नहीं हा पाता, पराधीन ही रहता है, जन्म मरण, रोग, शोक, खेद क़ेश आदि दुःखों को

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भोगा करता है, स्वतंत्रता पूर्वक अपने ज्ञान दर्शन वो, सुख आदि गुणों का आस्वादन नहीं कर सकता। इसी लिये प्रत्येक संसारी जीव को यह जान लेना ज़रूरी है कि इन कर्मों का संयोग जीव से क्‍यों और केसे होता है इनसे मुक्त केसे हो सकता है जिन तत्वों में यह प्रयो- जन भत ज्ञान हो उन्हीं तत्वों को प्रयोजन भूत तत्व कहते हैं। अनादि काल से इन कर्मों का संब्न्‍्ध आत्मा के साथ चला आरहा है बन्ध होता है, पुराना कर्म फल देकर झड़ जाता है, इस क्रिया की अपेक्षा बन्ध सादि है जेंसे बीज से वक्ष ओर वक्ष से बीज, और फिर उस बीज से वक्त होता है | बीज वक्ष को संतान अनादि हैं ठीक उसी तरह राग देप मोह पर बद्ध कमें के उदय से होते हैं राग ढ्ंप मोह से फिर बन्ध होता, बन्ध से फिर राग द्वंप मोह होते हैं

आत्मा स्वभाव से रागादि रूप पर भाव का पर काये का कत्ता नहीं है, ओर ही भोक्ता है, मन बचन कायके निमित्त से योग होता है, आत्मा में सकम्प होता है इस से योग शक्ति काम करती है। यह योग भी नाम्न कर्म के उदय से वतेन करता है, योग से क्रिया होती है अशुद्भोपयोग से जो मोह के उदय से होता है क्रिया होती है, योग और उपयोग ही कर्ता भोक्ता हैं।

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यदि योग और उपयोग हों तो आत्मा परभाव का पर काये का पर वस्तु का कर्ता भोगता नहीं होगा स्वभाव से यह अपने ही शुद्ध भाव का करता भोक्ता है |

यदि जीव के स्वरूप का विचार अजीब (कर्म) से भिन्न किया जावे तो यह सर्वथा शुद्ध है। सिद्ध भगवान के समान अपने शुद्ध पूर्ण ज्ञान दर्शन वीय॑ सुख आदि गुणों का धारी है | वर्णादि रहित अमृर्तीक है। लोका- काश समान असंख्यात ग्रदेशी है, यह जीव अनेक साधारण तथा असाधारण गुणों और स्वभावों का धारक अखंड पिंड है। अपने द्रव्य क्षेत्र काल भाव की अपेक्षा अस्तिरूप है। पर द्रव्य क्षेत्र काल की अपेक्षा नांस्तिरुप है।

कर्मोद्य से संसारी जोव नारक, तियेंच, मनुष्य और देव इन चार गतियों में भ्रमण किया करता है, नारकियों देवों के बाहरी स्थूल शरीर वेक्रियक होता है तियेंच और मानवों का बाहरी शरीर औदारिक होता है इन शरीरों की स्थिति प्राणों पर निर्भर होती है--प्राण दस होते हें--मन, बचन, काय, तीन बल स्पशैन; रसना प्राण, चछु और कर पांच इद्रियें, आयु और श्वासोस्वास। देवों नारकियों तथा मनुष्यों के तो सब दसों प्राण होते हैं तिर्यचों के नीचे लिखे हुए भेद होते हैं।-- १--एकेन्द्रिय जीव---पथ्वी, जल, अग्नि, वायु वनस्पति,

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कायिक इन के चार प्राण होते हैं स्पशैन इंद्रिय, शरोर बल, आयु ओर श्वासो श्वास | २--दोइन्द्रिय जीव--लट आदि इनके प्राण होते हैं। स्पशेन, रसना इन्द्रियें शरीर और बचन बल, आयु और श्वासो श्वास | ३--तेइन्द्रिय जीव--चींवटी आदि इनके सात ग्राण होते हैं एक प्राण इन्द्रिय बढ जाती है | ४--चार इन्द्रिय जीव---मकक्‍्खी आदि इनके आठ ग्राण होते हैं। एक चच्तु इन्द्रिय बढ जाती है। ५४--पंचेन्द्रिय असेनी मन रहित--पानी का कोई सर्प- इसके नो ग्राण होते हैं। एक करण इन्द्रिय और बढ जाती है ६--पंचेन्द्रिय असैनी--गाय, मेंस, कबृतर, मोर, मगर- मच्छादि इनके दस प्राण होते हैं। मन बल बढ जाता है। इन ग्राणों की स्थिति बने रहने को जीवन कहते हैं, इन के वियोग का नाम मरण है, संसारी जीव अपने मन वचन काय इन योगों की चपलताई के कारण तथा कपाय भावों से कर्म बान्धते रहते हैं ओर उनका सुख दुखरूप फल भोगते रहते हैं, अज्ञानी जीव उन में लिप्त हो जाते है, ज्ञानी उनसे उदासीन रहते हैं |

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आत्मा के बहिरात्मा , अन्तरात्मा, परमात्मा भी तीन भेद किये गये हैं।--

वहिरात्मा--जो शरीरादि में आत्माका भाव रखता होवे जिस के ज्ञानादि गुण कर्मावरण से आच्छादित हो 'है हों और जिसकी परिणति निजरूप नहीं परिणमन कर रही है ये मिथ्यादृष्टि अशुद्ध जीव वहिरात्मा कहलाते हैं

अंतरात्म--जिनके अन्तरंग में से श्रम निकल गया हो, जो आत्मा को आत्मरूप और रागादि को कर्म कृत विकार जानते हों वे अन्तरात्मा कहलाते हैं |

परमात्मा जो सर्व कर्म मल रहित हैं, थे परमात्मा हैं।

इनके दो भेद्‌ हैं, एक सकल परमात्मा अरहन्त परमसेष्ठी जीवन्युक्त परमात्मा, दूसरे निकल परमात्मा अथांत सिद्ध परमेष्ठी | वहिरात्मा को छोड़ना चाहिये, अन्तरात्मा होकर परमात्मापद को प्राप्ति का प्रयत्न करना चाहिये।

इस प्रकार जीव तत्व को निश्चय से द्रव्य रूप शुद्ध जानना चाहिये, कर्म की अपेक्षा अशुद्ध जानना चाहिए। इस लिये अशुद्धता के कारण कर्मों का बन्ध दूर कर के जीव को शुद्ध दशा में प्राप्त करना ज्ञानियों का कतेब्य है। यह जीव स्वयं राग भावों के निमित्त से बनन्‍्ध को प्राप्त होता है और आप ही अपने वोतराग भावों से बनन्‍्ध से मुक्त होकर शुद्ध हो जाता है

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अजीब तत्व- जो पदार्थ चेतना गुण रहित हों उन्हें अजीव तत्व कहते हैं, इसके पांच भेद हैं-पुद्ठल, धर्म, अधम, आकाश, काल |

पुद्डल- जिस द्रव्य में रस, गन्ध, स्पशे, वर्णे यह चार गुण पाये जावें उसे पुद्गल कहते हैं पुद्गल के दो भेद है अणु ओर स्कन्ध पद्गल के एकाकी अविभागी (जिस का और खंडन हो सके) प्रमाणु को अणु कहते हैं | स्कन्ध-दो या दो से अधिक अणुओं के समुदाय को स्कन्ध कहते हैं | बाहरी निमित्तों से प्रमाणुओं से स्कन्ध स्कन्ध से प्रमाणु बनते रहते हैं | स्कन्ध पुद्गल द्रव्य, प्रकार के होते हैं--

(क) स्थल स्थुल--जो छेदने भेदने तथा दूसरे स्थान पर ले जाने योग्य हों और जो खंड किये जाने पर बिना किसी तीसरो चीज़ के संयोग के आप से मिल सकें जैसे काष्ट, पत्थर, कागज, आदि-

(ख) स्थुल--जो छेदने भेदने तथा अलग अलग किये जाने पर तुरन्त ही आपसे मिल सकते हैं, जेसे घी, तेल जल, दूध, आदि |

(ग) स्थल ब्त्म-- जो आंखों से तो दिखाई देवें परन्तु पकड़े जा सकें जेसे धूप चांदनी आकाश आदि |

(घ) वक्त स्थूल--जो आंखों से तो दिखाई देते हों

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परन्तु अन्य चार इन्द्रियों द्वारा जाने जाते हों जेसे

वाय, रस, गन्ध, शब्द आदि | (ड) ब्रृद्म--जो इन्द्रिय गम्य हों अथोत््‌ किसी भी

इन्द्रिय द्वारा जाने जा सकें जैसे कार्माण वर्गणायें (च) प्रत्ष्म-सच्म--जो कर्म वर्मेणाओं से भी वक्तम हों

दो अगु॒ के स्कन्‍्ध तक है |

धर्म द्रब्य--जो द्रव्य जीव और पुदूगल के चलने में सहकारौ होता है उसे धम द्रव्य कहते हैं, यह एक अमूर्तिक अखंड, लोकाकाश प्रमाण, असंख्यात प्रदेशी द्रव्य है | इसमें स्पश, रस, गन्ध, वर्ण नहीं पाये जाते- जेसे जल बिना किसी प्रेरणा के उदासीन रूप से मछली के तेरने में सहायक होता है, ठीक उसी प्रकार यह धर्म द्रव्य भी जीव और पुठ्लल की गति में उदासीन रूप से सहायक होता है।

अधमे द्रव्य -जो द्रव्य जीव और पुद्ठल के ठहरने में सहकारी होता है, उसे अधमे द्रव्य कहते हैं | धर्म द्रव्य की तरह यह द्रव्य भी एक अखंड, अमूर्तिक लोकाकाश प्रमाण असंख्यात ग्रदेशी है इस में भी स्पशे, रस, गन्ध, वर्ण नहीं हैं, जेंसे धर्म, द्रव्य, जीव और पृद्ठल के चलने में सहकारी होता है वेंसे ही अथम द्रव्य उनके ठहरने में सहकारी होता है जेसे छाया पथिकों के ठहरने में उदासीन

( १६ ) रूप से सहकारी होती है वेसे ही अधम द्रव्य उदासीन रूप से जीव पुट्टल द्रव्य के 5हरने में सहायक होता है। आकाश द्रव्य--जो द्रव्य सब द्रब्यों को अवकाश देने

की शक्ति रखता है उसे आकाश द्रव्य कहते हैं। यह एक सबसे बढ़ा अमूर्तिक द्रव्य है। इसके दो भेद हैं, एक लोकाकाश, दूसरा अलोकाकाश जहां जीव, पृद्ठल, धर्म, अधर्म, ओर काल, यह पांच द्रव्य पाए जाते हैं वह लोकाकाश कहलाता है, और जहां यह नहीं पाए जाते केवल आकाशदही आकाश पाया जाता है वह अलोकाकाश कहलाता है इन दोनों का सत्व जुदा जुदा नहीं है। द्रव्य एक है क्‍यों कि जुदा होने से अलोकाकाश में काल होने के कारण परिणमन होगा ओर अपरिणामी होने से द्र्य का विनाश होजायगा |

काल द्रव्य--जो द्रव्य सब द्रब्यों के परिवर्तन करने में समर्थ है जो निश्चय से बना हेतुत्न लचण से संय॒क्त है, उसे काल द्रव्य कहते हैं, “जेंसे रत्नों का ढेर सब स्थान रोक कर भी भिन्‍न रत्न को रखता है वेसे ही कालाणु सब लोकाकाश।में एक प्रदेश एक२ करके व्याप्त हैं, तथापि वह कभी किसी से मिलते नहीं हैं |”

निश्रय काल से द्र॒व्यों का परिणमन होता है द्रव्यों के परिणमन से व्यवहार काल का ज्ञान होता है, जिससे

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निश्चय काल का बोध होता है। घड़ी, घंटे, मिनिट आदि व्यवद्दार समय पृद्नलों के परिणमन से ही उत्पन्न होता है। निश्चय काल परिणमन के उत्पन्न करने में सहकारी कारण है | व्यवहार काल इस निश्चय काल की पर्यायहै | बत्म व्यवहार काल एक समय है पद्ल का एक परमाण जब मंद गति से एक कालाण से दूसरे निकटवर्ती 0४०८७) कालाण़ु पर जाता है तब समय पर्याय उत्पन्न होती है यह समय ही व्यवहार काल है जो कालाणु की पर्याय है |

जीव, पुद्ल, धमे, अधरम, आकाश और काल यह छः द्रव्य हैं, इनमें से काल बहु प्रदेशी नहीं है, बाकी पाँचों द्रव्यों को बहु प्रदेशी होने के कारण पंचास्ति काय कहा जाता है ! यह हहों द्रव्य नित्य अविनाशी हैं, इन की संख्या स्थिर हे, किसी विशेष समय कोई द्रव्य पैदा हुआ है, कमी कोर द्रव्य नष्ट होगा एक द्रव्य कभी दूसरे में मिल जायगा, छह द्रन्‍्यों के कभी सात आठ द्रव्य होंगे यह छहों द्रव्य सत्‌ रूप अनादि अनन्त हैं

जीव और पृद्ल चलने ठहरने, अवकाश पाने, तथा पर्याय पलटने का झुख्य कार्य जगत में किया करते हैं उनके इन चारों कामों में शोष चार द्रव्य क्रम से सहायक

( रहै )

होते हैं यह नियम है कि प्रत्येक कार्य के लिये उपादान ओर निमित्त इन दोनों कारणों की आवश्यकता है। उपादान कारण तो जीव और पुद्ठल आप ही हैं; निमिच कारण गमनादि में धर्मादे शेष चार द्रव्य हैं। इस प्रकार जीव और अजीव तत्व का स्वरूप जान लेने से यह बोध हो जाता है कि यह लोक छह द्रव्यों का सम्मदाय है | इन छह द्रव्यों के सिवाय लोक में अन्य कुछ भी नहीं है

आखबतत्व-- जीव के रागादिक परिणामों के कारण मन वचन काय के योगों द्वारा, पुद्रल परमाणुओं के आने को आख़व कहते हैं। आख्रव दो प्रकार का होता है भावास्रव ओर द्र॒व्यास्रव

भावास्रव-- आत्मा के जिन रामादि परिणामों से पूद्रल द्रव्य कम रूप होते हैं, उन भावों के होने को भावासव कहते हैं | भावासव के पांच भेद हैं पांच मिथ्यात्व, बारह अविरति, पीस कपाय, ओर पंदरह योग, कुल-५+१२+२५+१५८४७ (विशेष के लिये देखो तत्वाथे क्षत्र अध्याय )

दृब्याख़व-- ऐसे पृद्टल परमाणुओं का कि जिन में नानावरणादि कम रूप होने की शक्ति होती है आत्मा के साथ एक ज्षेत्रावगाही होने के लिये आना द्रव्याश्वव कदलाता है।

. (२१२)

आखव दुखदाई होता है बुद्धितान पुरुष इसे कम बन्ध का कारण जान सदेव ही इसके कारणों से विश्वुख रहा करते हैं

बन्धतत्व--जीवों के अशुद्ध भावों के कारण खिंचे

हुवे पूद्लल परमाणुओं का, ज्ञानावरणादि रूप, अपनी स्थिति सहित, अपने रस संयक्त, आत्म प्रदेशों के साथ सम्बन्ध रूप होने का नाम बन्ध है। बन्ध दो प्रकार का होता है एक द्रव्यबन्ध, दूसरा भावषन्ध

द्रव्यवन्ध-- पुदूगल कार्माण जाति की वर्गणाएँ समस्त लोक में फेली हुई हैं, इन वर्गणाओं का आत्मा की योग शक्ति परिणमन से खिंच कर आत्माके प्रदेशों के साथ परस्पर एक त्षेत्रावगाही संबन्ध कर लेने का नाम द्रव्यवन्ध है

भाव बंध--उपयेक्त द्रव्य बंध के नि्मित्त कारण आत्मा के शुभ ओर अशुभ परिणाम हैं, इन भावों को भाव बंध कहते हैं।

बंध के चार भेद हैं। प्रकृति बंध, श्रदेश बंध, स्थिति बंध, अनुभाग बंध इनमें से प्रकृति बंध ओर प्रदेश बंध तो मन बचन काय योगों की क्रिया से होते हैं ओर स्थिति बंध ओर अनुभाग बंध क्रोध, मान, माया, लोभ कषायों से होते हैं ( विशेष के लिए देखो तत्वाथ ब्रत्र

( र३ )

अध्याय )

संवर तत्व--जीव के रागादिक अशुद्ध परिणामों के अभाव होजाने से कर्म परमाणुओं के आसव का रुक जाना संवर तत्व कहलाता है | संवर भी दो प्रकार का होता है, भाव संवर और द्व॒ब्य संवर | निर्मल शुद्ध आत्माके अनु- भव के बल से शुभ तथा अशुभ भावों का रुकना भाव संवर है | व्रत समिति, गुप्ति, दशधर्म, बारह भावना आदि सब भाष संबर के ही भेद हैं। द्रव्य कर्मों के आख्रव के रुक जाने को द्रव्यसंवर कहते हैं

निर्जेर तत्व-- जीव के शुद्धांपयोग के बल से अथवा स्थिति पर्ण होजाने से, बन्धे हुए कर्मों के एकादेश नाश होने को निजेरा कहते हैं | यह निज॑रा दो प्रकार की होती है | सविपाक निजेरा, ओर अविपाक